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अप्रैल 23, 2017 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

लघु कथा

            सब ठीक है...      हर शाम की तरह आज भी मनोज ने शिखा को फोन किया और मुस्कराते हुए पूछा कैसी हो शिखा ?शिखा ने उत्तर दिया ठीक हूँ .आप कैसे हैं ?मनोज ने कहा मैं भी ठीक हूँ . फिर उसने पूछा .तुमने खाना खाया ?शिखा ने उत्तर दिया हाँ खा लिया .और आप ने खाया मनोज ने कहा हाँ खा लिया हूँ .कुछ देर लगभग ३० सेकेण्ड तक दोनों चुप रहे फिर मनोज ने एक लाइन का कोई गीत गुनगुनाया .चुप होते ही बोला  ठीक है फिर गुड नाईट . शिखा ने भी कहा गुड नाईट . मनोज ने फोन को जेब में रखते हुए जो लाइन गुनगुना रहा था वह स्पष्ट रूप से गाने लगा जिन्दगी प्यार की दो चार घडी होती है ...... जितनी भी हो ये उम्र ....,

लिखना मौन की व्याख्या है

             हम लिखते वक्त मौन रहते है .या जब भी लिखते हैं मौन में जो संवेगिक उफान आता है उसके कारण लिखते है .लिखना भी कई प्रकार का होता है लिखने के लिए जब लिखा जाता है  तो उसमें  वह बात नहीं होती जो मौन में उफान के कारण होती है .लिखते वक्त हम कुछ नहीं बोलते है हमारी जितनी  भी उर्जा होती है वह दिमाग खर्च कर रहा होता है कल्पना के घोड़े को दौड़ाने में भावनावों को शब्द रूप देने में .हम कोई थीसिस लिखते है तो एकांत में जा कर लिखतें है तो ज्यादा अच्छा लिख पातें है .हमारे सारे  महाकाव्य जंगल के घोर सन्नाटे में लिखे गये ,उसमें जो काल्पन और भावनावों की उडान है वह डूब जाने लायक है .जब लेखन में गहराई होती है तभी तो पाठक उसमें डूब पाता है .इसलिए जो भी लिख रहें है उनका यह दायित्व हो जाता है कि पाठक के डूबने लायक गहराई दें अपने लेखन में .एक बात यह भी है की आज का ज्यादातर पाठक डूबना नहीं चाहता है लेकिन फिर भी लेखक का दायित्वा है की वह अपनी रचना में व्यापक गहराई दे .और एक बात यह भी है की यह कोई तालाब तो है नहीं की फावड़ा लिया और गहरा कर दिया .यह तो म...

मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः ।

                                       भाग-१               दिमाग जिसका ध्यान आते ही हमारे सामने एक तंत्रिकवों का गुच्छा घुमने लगता है . हमारे सामने सोचने की शक्ति निर्णय लेने की शक्ति का प्रत्यय बनता है .और एक चेतना है जो हमारे शारीर में विद्यमान है .वह कहाँ है इसका कोई चित्र हमारे सामने नहीं बनता है .हमें पता नहीं है की चेतना रहती कहाँ है.बस कभी कभी जब दिमाग कुछ गलत(गलत सही सांस्कृतिक होता है  ) कह रहा होता है ,जैसे किसी को बचाने की इच्छा तो हो रही है लेकिन हमें दिमाग रोकता है .कल्कुलेसन करने लगता है कि फायदा होगा की नुकसान .जबकि जो आवाज हमारे अन्दर (अन्दर का मतलब दूसरी आवाज )से आ रही होती होती है की उसको बचा लो वह आवाज पुकारती रहती है कि उसे बचा लो .अब जो आवाज  बचा लो कह रही थी उसे हम दिल  कहने लगते हैं .जो नफा नुकसान की बात कर रहा है उसे हम दिमाग कहने लगते है .मैं इन दोनो में कौन दिल  की आवाज है और कौन दिमाग की यह नहीं जानत...

तुम्हारा ख़त

उषा की किरणों में लिपटा तुम्हारा ख़त जब खोलता हूँ तो शब्द एसे अन्दर जातें है जैसे केले के पत्तों से चमकती हुयी ओस की बूंद जमीन पर गिरकर ख़तम हो जाती है महुए की सुगंध आती है , तुम्हारे शब्दों से तुमारी चिट्ठी जब सुबह मोबाइल को गनगना जाती है तो एसा लगता है जैसे आम की बगिया में सूखे पत्तों पर अमिया के टिकोरे गिर गये हों तुम्हारी चिट्ठी को जब मैं खोलता हूँ तो जैसे चने और गेहूं के पकाने की सुगंध आती है तुम्हारे शब्दों से ..

समय की रेत

जब भी लौटता हूँ तुम्हारे पास से समेट लेता हूँ कुछ पल समेट लेता हूँ कुछ यादें समेट लेता हूँ तुम्हारा प्रेम और कुछ आंसूं की बूंदें जब भी मैं लौटता हूँ समेट लेता हूँ समय की रेत और बिखरा देता हूँ पन्नो पर दीवारों पर हर उस वास्तु पर जहाँ तक जाती हैं मेरी नजरें बिखरा देता हूँ तुम्हारी यादों रंग जहाँ भी खाली दीखता है और फिर घिरा रहता हूँ उसी में दिन भर रात भर रोना मुस्कराना सब कुछ उसी में होता है तुम्हारे यादों का संगीत तुम्हारी प्यार की महक तुम्हारे चेहरे की मुस्कराहट महसूस करता हूँ घिरा रहता हूँ दिन भर रत भर तुम्हारी यादों में मिलता रहूगां तुमसे एसे ही और भरता रहूँगा रंग हर एक खली पण में जब तक मेरी पूरी दुनियां पूरी तरह तुम्हारे रंग में नहीं रंग जाती …

अस्तित्व का संकट

     हम क्यों जी रहे हैं  ?हम जन्मे क्यों है ?जन्म लेने के पीछे उद्देश्य क्या है ?सकल जीव जगत क्यों जी रहा है ?क्या हमें किसी ने भेजा है .या फिर  हम मात्र एक संयोग हैं .यदि किसी सत्ता ने हमें यहाँ भेजा है तो हमारा कुछ मकसद होगा ?यदि हमारा कोई मकसद नहीं तो तो फिर हम क्या कर रहे हैं ?ये सारे प्रश्न हमें बेचैन कर देते हैं .ये प्रश्न अस्तित्व के संकट के प्रश्न हैं .जिनसे गुजरने के बाद ही हम सही रूप में अपने आप को समझ पाते हैं .यह भी मन  में आता है कि समझ के ही क्या कर लेगें .क्यों की कुछ करना और कुछा न करना सब बराबर है .कुछ पा  कर भी कुछ नहीं मिल सकता है .यह सब  भी इसी संकट का ही एक रूप है .अब यहाँ पर या तो हम अपने जीवन को ख़तम कर सकते हैं या जीवन को किसी एसे उद्देश्य को पाने में लगा दें जिससे हमें यह पता चल जाए की हम जन्में क्यों हैं .यहाँ पर मोटिवेशन कुछ जानना है .यहाँ पर सृजन की भावना काम करती है .यह सृजन कुछ पाने की चाह नहीं रखती .यहाँ सृजन का मतलब परमानन्द से है .        हमारा अस्तित्व क्या है ?इसी राह पर चल कर दर्शन और विज्ञ...