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वैचारिक गुलामी और तर्क

  उनको पता है की विचारों की लड़ाई में वे हार जायेगें क्योंकि विचारों की लड़ाई हमेशा तर्क से होती है और तर्क वे करना नहीं चाहतें हैं क्योंकि तर्क उनके खिलाफ ही जाकर बोलेगा .इसलिए वे तर्क तो नहीं कर सकते लेकिन जो तर्क कर रहा है उसको हानि पहुंचाकर विजय पताखा लहराना चाहते हैं जो की संभव नहीं है .विचारों की लड़ाई हमेशा विचार से ही किया जाता है .             पाश्चत्य दर्शन में मन शारीर सम्बन्ध पर बहुत विचार दिया गया लेकिन मन उअर शारीर की सही से व्याख्या नहीं हो पाई .मन का मतलब विचार और शारीर का मतलब विस्तार .इनदोनो का जुडाव कहाँ होता है यह आज भी चर्चा का विषय है अब बात वही आती है कि यदि विचार और विस्तार का सम्बन्ध ही नहीं है तो इस विस्तार (शारीर )को मार  कर कोई विचार को कैसे खतम कर सकता है .मतलब विचारों की लड़ाई केवल वैचारिक जगत में ही संभव है .उसको मरने के लिए तर्क की जरूरत होती है .तर्क हमेशा उनके खिलाफ जा कर खड़े होते हैं .इसलिए तर्क न करना उनकी आवश्यक मज़बूरी है .              तर्क करना मानव होने के प्रमुख लक्षणों में...