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इमोशनल अत्याचार

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         इमोशनल अत्याचार दुनिया में होने वाली सबसे बड़ी हिंसा है। इमोशनली तौर पर किसी से हमदर्दी प्राप्त करते–करते कब इमोशनल ब्लैकमेलर हो जाते हैं हमें पता ही नहीं चलता है। अतः इसकी खोज हमें करते रहना चाहिए कि कहीं हम किसी के ऊपर इमोशनल अत्याचार तो नहीं कर रहे हैं।इस प्रकार की हिंसा अपनी अहमियत बताने से प्रारम्भ होती है।हम सोचते हैं कि किसी के जीवन में हमारी अहमियत  खत्म हो रही है । हम चाहते हैं कि सामने वाला व्यक्ति पहले जैसी अहमियत हमें दे। लेकिन ऐसा ना होने पाने पर हम दुखी होते हैं और इमोशनल अत्याचार करना प्रारंभ कर देते हैं। इस अत्याचार की शुरुआत  छोटे स्तर से प्रारंभ होती हैं जैसे "हम कौन होते हैं तुम्हारे" या "अब तुम वैसे नहीं रहे जैसे पहले थे" इस प्रकार की तमाम बातें होती हैं। इसका बड़ा रुप है ; (रोते हुए) "मेरी एहमियत तुम्हारे जीवन में थी ही नहीं सब दिखावा था" यहां तक पहुंची है। कभी-कभी यह बहुत विकराल रूप भी ले लेती है। इमोशनल अत्याचार एक प्रकार का मानसिक अत्याचार है और यह शारीरिक अत्याचार तक बढ़ जाता है। यह अत्याचार की अंतिम सीमा होती है। लेकि...

मन्दिर का प्रसाद

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  मं गरी दिन भर के मजदूरी और मेहनत के बाद दो वक्त की रोटी का जुगाड़ कर लेती है. वह अपना और अपने दो बच्चों और एक बुड्ढे ससुर का पालन पोषण करती है.उसके पति दो साल पहले ही कच्ची शराब पीने के कारण चल बसे थे तब से आज तक उसने किसी के सामने हाथ नहीं फैलाया मेहनत मजदूरी करके किसी प्रकार से गृहस्त का बोझ ढोती आ रही है।जब मनरेगा में काम रहता है तो मनरेगा में करती है नहीं तो किसी भी किसान के यहां या किसी के भी घर मेहनत मजदूरी करके वह काम चलाती है। जब कोई काम नहीं मिलता तब पर भी वह जंगल जाती है लकड़ियां काट कर लाती है और बेच लेती है मतलब वह किसी भी दिन छुट्टी नहीं लेती या यूं कहे कि मजदूर के जीवन में कोई रविवार नहीं होता. वह अपना काम पूरी ईमानदारी और लगन के साथ करती है और उसी प्रकार से उसको मजदूरी की भी उम्मीद रहती है. इसीलिए गांव भर में उसे बहुत बड़ा झगड़ैल औरत माना जाता है।लेकिन सबको पता है कि वह काम बहुत मेहनत से करती है इसलिए उसको गांव में काम मिल जाता है.      एक सुबह मंगरी के पास कोई काम नहीं था उसने सोचा कि आज जंगल से लकड़ियां काट कर लाती हूं। लेकिन संयोग से गांव में मंदि...

रंगों की दुनियां The world of colours

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एक चित्रकार के मन में एक दिन एक अजीब सा विचार आया कि वह एक ऐसा चित्र बनाए जिसमें केवल एक ही रंग हो। उसने तुरंत  ब्रश उठाया और सफेद कागज पर सफेद रंग से कुछ बनाना शुरू किया लेकिन कुछ ही देर बाद उसे समझ आया कि वह ऐसा करने में असर्थ है। क्या आप एक ऐसे चित्र की  कल्पना कर सकते हैं जो एक रंग से बना हो? कोई भी चित्र एक रंग से नहीं बनाया जा सकता है। कम से कम दो रंग चाहिए ही चाहिए।क्या आप एक रंग से बने चित्र की कल्पना कर सकते हैं? यह दुनियां हमे इसलिए दिख रही है क्योंकी इसमें हजारों रंग है।यदि दुनियां में एक रंग होता तो हम अंधे होते। यदि हम मान रहें  हैं कि दुनियां  केवल  एकरंगी  हो जाए तो असल में हम अपने आप को अंधत्व की तरफ धकेल रहें हैं। हमारे जीवन में जितने ज्यादा रंग जुड़ते जाते हैं उतने ज्यादा हम अपने आप को रंगीन पाते हैं। रंगों की दुनियां कितनी आश्चर्यजनक है, कितनी एकता है रंगीन में कितनी सहिष्णुता है रंगों में एक दूसरे में मिला दीजिए दोनो एकाकार हो कर एक नया रंग बना देते है। सूर्य की किरणों में सात रंग होते हैं लेकिन कितनी खूबसूरत बात है कि सातों जब एक साथ हो...

आख़िर यह जिंदगीनहीं तो क्या?

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  पेट भरकर खाए मीठा पान बातें की वैचारिक, बौद्धिक खुश हुए गंगा किनारे सरसों के पीले फूलों को देखकर और दु:खी भी हुए गंगा-जल देखकर  चिंता व्यक्त की आज की अंधश्रद्धा पर बातें की मार्क्सवाद, स्वच्छंदतावाद की,  मंसूबे बांधे भविष्य के  सामाजिक कार्यों की रूपरेखा बनाई घरौंदे बनाये रेत के किसानों से मिले खेत में।  मादरे हिंद की बेटियों से मिले और केदार की चाय पीकर लौट आये अपने-अपने आशियाने। आख़िर यह ज़िंदगी नहीं तो क्या? ~ प्रशांत साल 2012 का कोई दिन.

क्षितिज

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1. मैंने देखा थोड़ी दूर पर था क्षितिज मैंने पाना चाहा कदमों के साथ स्वप्न भी बढ़ने लगे स्वप्नों के साथ चाहत भी. 2. धान के लहलहाते खेत को पार किया तो गेहूँ के बालियों के बाद दिखा क्षितिज गेहूं के सुर्ख़ खेतों के पार चिलचिलाती धूप में मृग मरीचिका के बाद झिलमिलाता दिखा क्षितिज मैं हैरान था जब भी मैं सिर उठा क्षितिज देखता मुझे एहसास होता अभी उतनी ही दूर है क्षितिज जहां से मैंने पहली बार देखा था. फ़िर मैं पीछे लौटना चाहा और देखा तो धान के लहलहाते  खेतों के पार उतनी ही दूर था क्षितिज. 3. अब मैं लौटना चाहता हूँ फ़िर से वहीँ जहां से चाला था पर सोचता हूं क्या अब लौटा जा सकता है या फ़िर कोई लौट पाया है कभी. यदि लौट पाता कोई तो सारी आत्महत्याएं रुक न जाती तो कभी बसंत जा पाता मेरे बगीचा से या फिर उसके बालों में सुख जाता पलाश का फूल. फिर मैं सोचता हूं काल चक्र का पहिया सीधे चलने के लिए अभिशप्त है. यदि नहीं तो सभी चेतन जड़ न हो जाते         क्षि्ष््

प्रतिध्वनी

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 प्रतिध्वनी  मैं पहले हैरान हुआ फिर मन हिरन हो गया कुलाचें मारने लग फिर परेशां हुआ फिर मैंने खुदा को धन्यवाद दिया फिर मैंने एक दिन सोचना सुरु किया शब्दों के अंतराल में गया तो मैंने देखा मेरे ही शब्द बिखरे थे जिन्हें मैं बीनता हुआ उसके बहुत करीब पहुच गया इतना करीब की वह खुद नहीं दिखाई पढ़ रही थी मैंने बहुत कुछ बोला पर वह मूर्ति मौन थी मैं फिर से हैरान हुआ परेशां हुआ वह मूर्ति मेरी ही आवाज थी और मैं अपनी ही प्रतिध्वनि पर मुग्ध होता रहा ....

कुछ तो लोग कहेंगे

संजय दत्त जेल से निकले हैं, उसके स्वागत  के लिए उनकी पत्नी आगे बढ़ती हैं लोगों की भीड़ से कोई प्रशंसक फोटो लेने के लिए  आवाज़ लगा रहा है,  संजू पत्नी को गले लगाते हैं, भीड़ के शोर से वही आवाज़ फिर आती है ‘’संजू बाबा इधर देखो एक फोटो लेनी है। तभी उनका दोस्त कमली (विक्की कौशल ) आता है,  दौड़कर गले लगते हैं और कुछ पुरानी यादों को ताज़ा करते हैं।  फिर वही आवाज़ थोड़ा गुस्से में आती है लेकिन संजय दत्त अपनी गाड़ी में बैठ जाते हैं, तभी भीड़ से वही  आवाज़ फिर आती है “टेररिस्ट कहीं के, क्यों इतना भाव खा रहा है एक फोटो ही तो लेने को बोल रहा हूँ।   इस आवाज़ पर गाड़ी में बैठे सभी लोग सन्न रह जाते हैं गाड़ी का शीशा ऊपर उठता है। फिल्म में बायोपिक लेखिका का  किरदार कर रही अनुष्का   संजू को उनके ऊपर लिखी किताब देती हैं जिसका शीर्षक होता है,  ‘’कुछ तो लोग कहेंगे’’ और फिर किशोर  Vकुमार की आवाज़ में फिल्म ‘अमर प्रेम’ का गाना बजता है ‘कुछ तो लोग कहेंगे लोगों का काम है कहना’ इसी निष्कर्ष पर राजकुमार हिरानी की  फिल्म ‘संजू’ ख़त्म होती है।    ...