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दिसंबर 27, 2020 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

क्षितिज

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1. मैंने देखा थोड़ी दूर पर था क्षितिज मैंने पाना चाहा कदमों के साथ स्वप्न भी बढ़ने लगे स्वप्नों के साथ चाहत भी. 2. धान के लहलहाते खेत को पार किया तो गेहूँ के बालियों के बाद दिखा क्षितिज गेहूं के सुर्ख़ खेतों के पार चिलचिलाती धूप में मृग मरीचिका के बाद झिलमिलाता दिखा क्षितिज मैं हैरान था जब भी मैं सिर उठा क्षितिज देखता मुझे एहसास होता अभी उतनी ही दूर है क्षितिज जहां से मैंने पहली बार देखा था. फ़िर मैं पीछे लौटना चाहा और देखा तो धान के लहलहाते  खेतों के पार उतनी ही दूर था क्षितिज. 3. अब मैं लौटना चाहता हूँ फ़िर से वहीँ जहां से चाला था पर सोचता हूं क्या अब लौटा जा सकता है या फ़िर कोई लौट पाया है कभी. यदि लौट पाता कोई तो सारी आत्महत्याएं रुक न जाती तो कभी बसंत जा पाता मेरे बगीचा से या फिर उसके बालों में सुख जाता पलाश का फूल. फिर मैं सोचता हूं काल चक्र का पहिया सीधे चलने के लिए अभिशप्त है. यदि नहीं तो सभी चेतन जड़ न हो जाते         क्षि्ष््