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जब तुम बिछुड़ना तो....

जब तुम बिछुड़ना तो ... कह देना कोई बात झूठी  ही सही जो समय के जख्मों पे मरहम लगा दे … जो तेज होती सांसों को थमा दे जो लोरी बन के मुझे सुला दे … बोल जाना कोई सब्द झूठा ही सही …. जो चिपक जाये मेरे दिल की दीवारों पर लिख देना कोई कविता झूठी ही सही जिसकी व्याख्या में गुजर जाये ये जीवन   बहा देना कुछ आंसू झूठा ही सही जिससे मुरझाये हुए हुयी दिल की बगिया हरी हो जाय सदा के लिए जब बिछुड़ना तो जाते जाते रुक जाना और पीछे मुड़ क़र देख जाना झूठा ही सही …. जो राह के धूप को, छाव कर दे...

झोका हवा का ...

तुम हमेशा ख्वाबों में आती हो तन्हा रातों में झींगुरों की आवाज पर बैठ कर   कभी ह वा का झोका बन कर  आना, देखना मैं नें तुम्हारे लिए एक  पेड़ लगाया है गुलमोहर का , जिस को मैं प्यार में आंसुओं की तरह सींच कर बड़ा करूगां जिस को हवा में झूमते हुए देख तुम्हारे आने का आहट महसूस करूगां जिस की छाया में बैठ मैं कम करूगां तुमसे  मिलने की तपन को मैं उसकी डाली पे झूला डालूगाँ कभी हवा का झोका बन कर आना और हलके से हिला देना झूले को और देखना मैं तुमसे वैसे ही बातें आज भी करता हूँ जैसे मैं पहले किया करता था  ... गुलमोहर के लाल गुच्छे जब  टहनियों पर लगेंगे जब खेतों में पीली सरसों के फूल लहरानें लगें तब आना हवा का झोका बन कर लहरा जाना गेहूं के हरे खेतों को और जाते हुए देख जाना ये गुलमोहर ,सरसों के फूल वैसे ही दिखाइ देतें हैं जैसे पलास के फूल तुम्हारे तुम्हारे बालों में लगते थे जब सावन आएगा मैं पत्ते से  छन कर आती बूंदों में मैं भीगा करूगां   आना तुम भी हवा का झोका बन कर और छू कर मेरे बदन ...