प्रतिध्वनी
प्रतिध्वनी मैं पहले हैरान हुआ फिर मन हिरन हो गया कुलाचें मारने लग फिर परेशां हुआ फिर मैंने खुदा को धन्यवाद दिया फिर मैंने एक दिन सोचना सुरु किया शब्दों के अंतराल में गया तो मैंने देखा मेरे ही शब्द बिखरे थे जिन्हें मैं बीनता हुआ उसके बहुत करीब पहुच गया इतना करीब की वह खुद नहीं दिखाई पढ़ रही थी मैंने बहुत कुछ बोला पर वह मूर्ति मौन थी मैं फिर से हैरान हुआ परेशां हुआ वह मूर्ति मेरी ही आवाज थी और मैं अपनी ही प्रतिध्वनि पर मुग्ध होता रहा ....