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जुलाई 18, 2021 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

इमोशनल अत्याचार

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         इमोशनल अत्याचार दुनिया में होने वाली सबसे बड़ी हिंसा है। इमोशनली तौर पर किसी से हमदर्दी प्राप्त करते–करते कब इमोशनल ब्लैकमेलर हो जाते हैं हमें पता ही नहीं चलता है। अतः इसकी खोज हमें करते रहना चाहिए कि कहीं हम किसी के ऊपर इमोशनल अत्याचार तो नहीं कर रहे हैं।इस प्रकार की हिंसा अपनी अहमियत बताने से प्रारम्भ होती है।हम सोचते हैं कि किसी के जीवन में हमारी अहमियत  खत्म हो रही है । हम चाहते हैं कि सामने वाला व्यक्ति पहले जैसी अहमियत हमें दे। लेकिन ऐसा ना होने पाने पर हम दुखी होते हैं और इमोशनल अत्याचार करना प्रारंभ कर देते हैं। इस अत्याचार की शुरुआत  छोटे स्तर से प्रारंभ होती हैं जैसे "हम कौन होते हैं तुम्हारे" या "अब तुम वैसे नहीं रहे जैसे पहले थे" इस प्रकार की तमाम बातें होती हैं। इसका बड़ा रुप है ; (रोते हुए) "मेरी एहमियत तुम्हारे जीवन में थी ही नहीं सब दिखावा था" यहां तक पहुंची है। कभी-कभी यह बहुत विकराल रूप भी ले लेती है। इमोशनल अत्याचार एक प्रकार का मानसिक अत्याचार है और यह शारीरिक अत्याचार तक बढ़ जाता है। यह अत्याचार की अंतिम सीमा होती है। लेकि...

मन्दिर का प्रसाद

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  मं गरी दिन भर के मजदूरी और मेहनत के बाद दो वक्त की रोटी का जुगाड़ कर लेती है. वह अपना और अपने दो बच्चों और एक बुड्ढे ससुर का पालन पोषण करती है.उसके पति दो साल पहले ही कच्ची शराब पीने के कारण चल बसे थे तब से आज तक उसने किसी के सामने हाथ नहीं फैलाया मेहनत मजदूरी करके किसी प्रकार से गृहस्त का बोझ ढोती आ रही है।जब मनरेगा में काम रहता है तो मनरेगा में करती है नहीं तो किसी भी किसान के यहां या किसी के भी घर मेहनत मजदूरी करके वह काम चलाती है। जब कोई काम नहीं मिलता तब पर भी वह जंगल जाती है लकड़ियां काट कर लाती है और बेच लेती है मतलब वह किसी भी दिन छुट्टी नहीं लेती या यूं कहे कि मजदूर के जीवन में कोई रविवार नहीं होता. वह अपना काम पूरी ईमानदारी और लगन के साथ करती है और उसी प्रकार से उसको मजदूरी की भी उम्मीद रहती है. इसीलिए गांव भर में उसे बहुत बड़ा झगड़ैल औरत माना जाता है।लेकिन सबको पता है कि वह काम बहुत मेहनत से करती है इसलिए उसको गांव में काम मिल जाता है.      एक सुबह मंगरी के पास कोई काम नहीं था उसने सोचा कि आज जंगल से लकड़ियां काट कर लाती हूं। लेकिन संयोग से गांव में मंदि...