मन्दिर का प्रसाद
मंगरी दिन भर के मजदूरी और मेहनत के बाद दो वक्त की रोटी का जुगाड़ कर लेती है. वह अपना और अपने दो बच्चों और एक बुड्ढे ससुर का पालन पोषण करती है.उसके पति दो साल पहले ही कच्ची शराब पीने के कारण चल बसे थे तब से आज तक उसने किसी के सामने हाथ नहीं फैलाया मेहनत मजदूरी करके किसी प्रकार से गृहस्त का बोझ ढोती आ रही है।जब मनरेगा में काम रहता है तो मनरेगा में करती है नहीं तो किसी भी किसान के यहां या किसी के भी घर मेहनत मजदूरी करके वह काम चलाती है। जब कोई काम नहीं मिलता तब पर भी वह जंगल जाती है लकड़ियां काट कर लाती है और बेच लेती है मतलब वह किसी भी दिन छुट्टी नहीं लेती या यूं कहे कि मजदूर के जीवन में कोई रविवार नहीं होता. वह अपना काम पूरी ईमानदारी और लगन के साथ करती है और उसी प्रकार से उसको मजदूरी की भी उम्मीद रहती है. इसीलिए गांव भर में उसे बहुत बड़ा झगड़ैल औरत माना जाता है।लेकिन सबको पता है कि वह काम बहुत मेहनत से करती है इसलिए उसको गांव में काम मिल जाता है.
एक सुबह मंगरी के पास कोई काम नहीं था उसने सोचा कि आज जंगल से लकड़ियां काट कर लाती हूं। लेकिन संयोग से गांव में मंदिर के पास पंडित जी के यहां पक्का घर बन रहा था उसे देखते ही पंडित जी चिल्लाकर उसे बुलाए और ईंट ढोने का काम दे दिया. वह भी खुशी-खुशी काम में लग गई और काम करती रही दोपहर में जब छुट्टी हुई तो सारे मजदूर अपने अपने घर को चले गए लेकिन मंगरी मंदिर के पास वाले हैंडपंप पर गई वहां उसने अपने हाथ पांव धोए और मंदिर वाले पीपल के पास जाकर बैठ गई. कड़ी धूप में काम करने के बाद पेड़ की छांव बड़ी ही अच्छी लगती है उसे भी बहुत अच्छी लग रही थी वह लेटना चाह रही थी लेकिन चबूतरे पर नहीं बैठ सकती थी क्योंकि वह चबूतरा इतना पवित्र था कि शायद उसके छूने से अपवित्र हो जाता. इसलिए वह चबूतरे पर ना जाकर पेड़ के नीचे वाले छांव में ही बैठ गई। उसे इस बात का कोई भी दुख नहीं था कि वह चबूतरे पर नहीं बैठ सकती है ज्यादातर गांव में यही होता है कि सब लोग किसी बात को स्वीकार कर चुके होते हैं। क्योंकि वह छोटी जात की है इसलिए वह चबूतरे पर बैठने नहीं गई.
मंदिर से प्रसाद की बड़ी अच्छी खुशबू बाहर आ रही थी बहुत बार उसका ध्यान मंदिर की तरफ गया लेकिन हिम्मत नहीं कर पाई घुसने की. दोपहर की सुनसान दुपहरिया कोई दूर दूर तक नहीं दिख रहा था उसका मन बार-बार प्रसाद लेने का हो रहा था उसने चारों तरफ देखा कोई नहीं था. वह धीरे धीरे मंदिर की तरफ बढ़ी मंदिर की देहरी को प्रणाम किया और अंदर घुस गई। यह उसके जीवन में पहली बार था कि वह उस मंदिर में गई थी। देखा तो बहुत सारे मिष्ठान भगवान को चढ़े हुए थे दो चार चूड़ियां और पूड़ी ऊपर सूजी का हलवा और दो तीन बेसन के लड्डू पड़े हुए थे उसने प्रसाद समझकर पूरियां और तीनों लड्डू उठा लिए,एक अपने लिए और दो अपने बच्चों के लिए । प्रणाम करके मिठाइयों को अपने आंचल में बांधते हुए बाहर आ ही रही थी कि मंदिर का पुजारी केदार कहीं से जनेऊ कान पर चढ़ाए और हाथ में लोटा लिए बड़ी तेजी से दौड़ा दौड़ा मंदिर की तरफ आ रहा था. शायद शौच करने गया था और झाड़ियों के पीछे सीधे मंदिर के को देख रहा था. यह देख मंगरी के प्राण ही सूख गए वह अब क्या करें उसको कुछ नहीं समझ में आ रहा था वह मन ही मन भगवान को मनाने लगी. केदार को दूर से समझ में नहीं आया कि वह कौन है लेकिन जब इसने पास से देखा कि वह मंगरी है उसके बाद उसके मुंह से धाराप्रवाह गालियां निकलने लगी इतनी भयंकर गालियां क्यों कोई सुन के अपने कान बंद कर ले. इतने पूजा-पाठ प्रवचन रामायण पाठ के बाद भी इस प्रकार की गालियां कौन देता है? शायद यह प्रश्न ही गलत है? प्रश्न तो यह बनता है कि वह गालियां क्यों न दे? वह उच्च कुल में जन्मा है और ऊपर से मंदिर का पुजारी और उसके ऊपर से उसने बहुत सारे ग्रंथ पढ़ रखे हैं। केदार गालियों पर गालियां दिया जा रहा है गुस्से से उसका चेहरा लाल हो गया है और हाथ जोड़कर मंगरी माफी मांग रही थी "महाराज गलती होई ग, भूखी लागी रहा महाराज ? अब कभऊ मन्दिर में न जाब. इतने में केदार ने लाठी उठाई और पीटते हुए बोला तोर इतनी हिम्मत कि फिर से मन्दिर में घुसी जाबे....और जाति सूचक भयंकर गलियां देने लगा। मंगरी के सिर पर डंडा लगते ही उसके सिर से खून की धार में पड़ी और उसके सारे चेहरे पर फैल गई वह किसी प्रकार से उसके चंगुल से भागी केदार ने डंडी फेंक के भी मारा और जब वह दूर जाने लगी तो फिर से भयंकर भयंकर गालियां देने लगा लेकिन हर गाली के बाद एक शब्द राक्षस बार-बार बोल रहा था जो कि उन सब गालियों में बहुत भयंकर गाली थी।असल में राक्षस केवल एक गाली नहीं है एक न्याय है हम किसी को राक्षस सिद्ध कर दें तो उसको मारने से गाली देने से उसके साथ बलात्कार करने से या फिर उसको जला देने से हमें पाप नहीं लगता बल्कि पुण्य होने लगता है। उसकी गालियों को सुनकर बहुत सारे गांव वाले मंदिर के पास पहुंच चुके थे और उन्हें इस बात की जानकारी भी हो चुकी थी कि मंगरी ने प्रसाद की चोरी की थी। जैसे-जैसे भीड़ बढ़ती गई वैसे वैसे और भी भद्दी गालियां और जातिसूचक गालियां केदार बोलता रहा और कुछ देर बाद इस अंदाज में चुप हुआ जैसे कि देवताओं में उसके ऊपर पुष्प वर्षा की, अजीब गर्व की अनुभूति हो रही थी जैसे उसने जीवन में सबसे अच्छा काम आज ही किया हो। असल में बात प्रसाद की चोरी की नहीं थी यही प्रसाद यह कोई उच्च कुल के व्यक्ति ने लिया होता तो उसे कहा जाता ईश्वर की ही सब संतान हैं और ईश्वर के ही घर से खाना ले लिया मतलब अपने माता-पिता के घर से खाना ले लिया इसे चोरी नहीं कहा जाएगा लेकिन मंगरी के लिए यह बात अलग थी क्योंकि वह अछूत थी। और उसे बकायदा विधि विधान पूर्वक चोर और राक्षस सिद्ध किया जा चुका था।
मंगरी जिस जिस रास्ते से भी गई रोते हुए सारी व्यथा सुनाते हुए गई लेकिन उसके चेहरे का खून देखकर लोगों को दया तो आता बाद में पता चला कि उसने मंदिर से प्रसाद उठाया था इसलिए सब की दया और करुणा कैसे गायब हो गई जैसे सूरज को देखते ही घास ओस गायब हो जाती है। प्राचीन और धर्म ग्रंथिय न्याय हो चुका था सबने उसके कर्मों का फल बताया सब ने कहा कि मंदिर अशुद्ध जब किया है तो उसका फल तो मिलेगा ही. खून देखकर दया सबको आती है लेकिन वह खून के धर्म के लिए बहा है वह खून नहीं रह जाता ना उसमें दया रहती है ना उसे देखकर किसी को दया आती है नहीं शर्म. मंगरी रोती हुई किसी से कोई सहायता ना मांगते हुए पैदल ही पैदल पुलिस थाने तक पहुंच गई. उसके घरवालों ने बहुत रोकने का प्रयास किया लेकिन वह नहीं रूकी। प्राचीन समय जिसे भारतीय इतिहास का सबसे स्वर्णिम काल समझा जाता था अब ऐसा समय नहीं था तब और अब मैं बहुत अंतर आ चुका था तब कोई मंगरी जैसी व्यक्ति मार खा कर उसे अपना कर्म फल समझकर चुप हो जाती थी लेकिन आज वह समय नहीं है आज समय बदल गया है. "मंगरी पुलिस थाने पहुंच गई" यह बदलाव आ चुका है. मंगरी को देखकर सभी पुलिसवाले सन्न रह गए उन्होंने सोचा कोई संगीन मामला है.तुरंत फाइलें उठा ली और सब तैयार हो गए किसके बताते ही तुरंत इसको न्याय दिया जाएगा। पुलिस ने पूछा कि क्या हुआ मंगरी ने कहा" जैसे एक छोटा बच्चा यदि उसकी कोई पिटाई कर दिया हो तो मां के पास पहुंचते ही तेज तेज रोने लगता है वैसे ही जब पुलिस ने पूछा क्या हुआ तो मंगरी का सारा दुख उसके रूदन में बह आया रोते रोते बोली..
रपट लिखावई आई हई साहब, हमके केदार महराज डंडा से मारेन ह, हमरे मनसेधु के मरे दूई साल होई ग केऊ हमर ऊपर अंगूरी नाही उठाएसी अउर येन हमके मारेन गैरिआएन... लेकिन जब पुलिस केदार का नाम सुना तो एफ आई आर लिखने वाली रजिस्टर रख दिया और एक डायरी उठाई. यह डायरी कानून की रजिस्टर नहीं थी यह डायरी और अनपढ़ लोगों को धोखा देने की डायरी थी इसमें कोई भी अनपढ़ व्यक्ति जो कानून के बारे में कुछ नहीं जानता वह इस प्रकार से आता है पुलिस ऐसा दो कारणों से करती है यह तो यह दिखाने के लिए कि उसके थाने पर क्राइम सबसे कम हुए हैं और दूसरा अपने जाति के किसी भी व्यक्ति को बचाने के लिए. मंगरी बताती गई और पुलिस ने सब डायरी में लिख लिया. यह कानून की किताब में लिखा जाता है तो फिर केदार को जेल जाना पड़ता है और उसके ऊपर मुकदमा हो जाता . पुलिस ने कहा कि आप घर जाओ आप केदार की गिरफ्तारी होगी. मंगरी वहां से घर चली आई । प्राचीन भारत और अब के भारत में इतना बस अंतर तो आया था कि न्याय के लिए कोई पीड़ित अदालत तक पहुंच जाता है लेकिन अभी भी न्याय मंगरी के चौखट तक नहीं पहुंच पा रहा है। और ऐसा तब तक संभव नहीं है जब तक कि न्याय की देवी आंधी ना हो जाए अभी न्याय की देवी आंख खोल कर देखती है की सामने वाला कौन है।
कुछ देर बाद पुलिस आई और सीधे मंदिर पर चली गई देखा तो मंदिर पर भीड़ लगी हुई थी सब लोग केदार को की वाहवाही कर रहे थे. पुलिस को देख सब आश्चर्य मानने लगे कि कैसा कलयुग आ गया है थोड़ी सी मार पिटाई हुई नहीं कि गांव में लोग पुलिस बुला ले रहे हैं इज्जत और शर्म नाम की कोई चीज ही नहीं बची है। उसी में से एक टीका लगाए हुए बूढ़ा आदमी बोला उ चमाइन क एतनी हिम्मत... हमरे जमाने में का मजाल हऊ कि पुलिश गाउन में पहुंच जाए. पुलिस केदार के पास पहुंची है और उसके पांव छूते हुए प्रणाम प्रणाम किया और कहां महाराज चलिए थोड़ा खानापूर्ति हो जाए नहीं तो बात आगे चली जाएगी तो मेरी नौकरी खतरे में पड़ जाएगी। ऐसा सुनते ही सब ठहाका मार हंस पड़े अब यह ठहाका कानून पर था संविधान पर था व्यवस्था पर था की पुलिस की चालाकी पर यह वही लोग जाने लेकिन केदार ने बाल्टी में पानी लिया पूरे मंदिर को साफ किया उसके बाद मंत्र पढ़ते हुए गंगा जल छिड़का खुद के माथे पर टीका लगाया और पुलिस के गाड़ी के पीछे बैठ कर चल दिए . सड़क मंगरी के मोहल्ले के बगल से होकर जाता थी जब उसने देखा कि पुलिस केदार को ले जा रही है तो उसको थोड़ा सुकून मिला उसने सोचा कि न्याय मिल गया. और उसने मन ही मन भगवान को शुक्रिया कहा.... और अपने ससुर से कहा कि भगवान के घर देर है अंधेर नहीं. केदार जब पुलिस थाने पहुंचा तो सब ने उसे प्रणाम किया। फिर केदार ने अपनी बहादुरी के किस्से पुलिस को सुना डाला किस प्रकार से उसको गाली दिया और किस प्रकार से उसको डंडे से पीटा और इस बात का जस्टिफिकेशन भी दे रहे थे कि लोग के साथ ऐसा ही किया जाना चाहिए. उसके बाद केदार ने अपने झोले से चिलम निकाली और चिलम चढ़ाया गया सबने चिलम पिया और चाय पानी हुआ सब बैठे रहे आराम से.
शाम होते-होते मंगरी का गुस्सा शांत हो गया था और उसने अपने सिर पर पट्टी भी बांध के कुछ जड़ी बूटी लगा ली थी. उसका दर्द शाम तक शांत हो गया था और गुस्सा भी। रात को नींद नहीं आ रही थी उसको बार-बार यही लग रहा था कि पुलिस महाराज को पीट रही होगी , उनको उल्टा लटका के पीट रही होगी हाय मैंने क्या कर दिया महाराज को पुलिस कितना पीट रही होगी उसके मन में यह बात आते ही उसको चैन नहीं मिल रहा था. उसके अपने घाव सूखे नहीं थे लेकिन उसे केदार के घाव की चिंता हो रही थी. उसने मिट्टी की तेल का दिया बुझाया और खुद यह सोचने लगी कि उसने प्रसाद क्यों लिया. क्या वह प्रसाद ना खाती तो मर थोड़े जाती ? अपनी 3 साल की बेटी से चिपक कर सोते हुए अपने मन को दिलासा दे नहीं थी कि सब कुछ तो भगवान का ही है तो फिर क्यों नहीं लेती प्रसाद? स्वामी जी के प्रवचन में भी उसने सुना था सब कुछ भगवान का है. मुझे मारे काहे मारे तो मारे ठीक लेकिन हमके गरियाए काहे...यहसोचते हुए वह सो गई।
सुबह हुई तो उसके मन में एक अजीब सी बेचैनी चल रही थी उसने जो किया था वह सही था और दूसरी तरफ था की पुलिस महाराज की पिटाई कर रही होगी? द्वार पर झाड़ू लगाते वक्त कलेवा बनाते वक्त वह इसी सोच में व्यस्त थी। अचानक ही उसके मन में पता नहीं क्या हुआ उसने अपनी चप्पल पहना और पुलिस थाने की तरफ चल गई. जब पुलिस थाने पहुंची तब केदार घर से नहा धो कर आ चुके थे और चाय पानी हो चुका था पुलिस थाने पहुंचते ही पुलिस ने केदार को छिपने के लिए भेज दिया और जब मंगरी थाने में गई तो पुलिस ने बताया कि उनकी खूब पिटाई हुई है और वह जेल में बंद हैं 7 साल की कैद होगी उन्हें तुम घबराओ मत यह सुन मगरी फूट फूट कर रोने लगा। उसके लगा कि उसने बहुत बड़ी गलती कर दी है उसने पुलिस से हाथ जोड़कर कहा कि "महाराज के छोड़ी द सब गलती हमही. करे हई..अपने आंचल आंचल से आंसू पूछते हुए तेज तेज से रोने लगी है। यह सुन पुलिस बहुत खुश हुई उसने कहा ठीक है हम तुम्हारा केस वापस लेते हैं और उन्होंने वह डायरी निकाली जिसमें उन्होंने रपट बातें लिखी थी और कुटिल मुस्कान के साथ उसके पन्ने को फाड़ दिय. और कहा कि अब केदार घर चले जाएंगे आप चिंता मत कीजिए और जाइए. मंगरी के घर जाते ही केदार फिर से पुलिस थाने में आए और सब ने एक दूसरे को देखा और ठहाके मार के सब एक दूसरे की चालाकी पर हंस दिए. हंसते हुए केदार के काले दांत दिख रहे थे अंदर सब कुछ काला ही है यह भी बड़ा साफ दिख रहा था, पुलिस थाने में थोड़ा हंसी मजाक के बाद "नारी सुभाव सत्य सब कहहीं, अवगुण आठ सदा उर रहहीं.."तुलसी दास की एक की चौपाई गाते हुए निकल गए। मंगरी घर पहुंची और हांथ में कुल्हाड़ी लिया और जंगल लकड़ियां काटने चली गई ताकि कल की रोटी का जुगाड़ हो सके।
~~चंद्र शेखर आज़द

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