शेखर के गांव में


            सुबह-सुबह चंद्रशेखर जी से जब मिले तो हम दोनों दही जलेबी खाने के लिए एक दुकान में पहुंचे प्रशांत जब इलाहाबाद आते हैं तो उनका लक्ष्य रहता है कि इस दुकान से दही जलेबी खानी है ,इस दुकान से प्याज के पकौड़े खाने हैं और इस दुकान से लस्सी पीनी  हैमैंने चंद्र शेखर जी के लिए भी ऐसा ही सोचा पर यह एक खराब शुरुआत थी क्योंकि चंद्रशेखर सौ ग्राम जलेबी भी पूरी नहीं खाना चाह रहे थे मीठे की अधिकता के डर से, पर जहाँ भी गए वही मिठायी खानी पड़ी,  इस पूरे दिन में हमने इतनी मिठाई खाई जितनी जितनी मैंने  सप्ताह  भर में या चंद्रशेखर ने पूरे महीने भर में नहीं खाई होगी,  चंद्रशेखर को उनके एक पुराने मित्र मिल गए उन्होंने हम सब को खूब मिठाई खिलाई यह कहते हुए साल भर के बाद तो मिले हो फिर जाने कब मिलोगे तो उनको यह जो प्यार भरी सजा मिल रही थी उसका साझीदार मैं भी था क्योंकि मैं भी उनसे साल भर के बाद ही मिल रहा था.


    शाम को 4:00 बजे  हम उनके गांव के लिए निकल पड़े हम बातें करने में इस कदर मशगूल थे कि जाना था जिस ओर हम उसकी विपरीत दिशा में थोड़ी दूर तक चले आए, फिर ध्यान आया तो चंदशेखर ने कहा अब यही तो है हमें ऑटो पकड़ने के लिए उस ओर जाना था और बातें करते हुए इधर चले आए जैसे लग रहा है कि पैदल ही पहुंच जाएंगे.  इसके बाद हमने बस पकड़ी बस ने 2 घंटे का सफर 4 घंटे में पूरा किया सड़क की हालत की वजह से शेखर ने कहा  मैंने तो सुना है  कि यहां के मुख्यमंत्री ने  भीष्म प्रतिज्ञा की है कि 15 जून तक सड़क के सारे गड्ढे खत्म हो जाएंगे खैर हमें क्या फर्क पड़ने वाला है हमें तो कहीं भी बैठकर बातें ही करनी है चाहे वह बस हो या कोई और स्थान.  यहां हम रात 8:00 बजे पहुंचे यहां से जाने के लिए कोई साधन नहीं मिल रहा था एक ही गाड़ी बची हुई थी Max उसके ड्राइवर ने इसे कुछ ज्यादा ही मैक्स समझ लिया था उसने छह लोग आगे छह लोग बीच में और छह लोग पीछे बैठाए थे हमारे सहित, इसके बाद हम चलने ही वाले थे कि उसे 2 लोग और मिल गए उन्हें भी पीछे की सीट के बीच की जगह में बैठा लिया उसकी बोलने का लहजा ऐसा था  कि हम यह तय नहीं कर पा रहे थे कि वह ऐसा परोपकार के लिए कर रहा है या लालच में । यह दो लोग भी ड्राइवर हीथे जिनकी गाड़ियां जब्त हो गई थी ।वह बता रहे थे कि मिर्जापुर की पुलिस कितनी मुस्तैद रहती है कि यदि आपकी गाड़ी में हवा कम हो तब भी आपको रूका लेगी आपकी गाड़ी जब्त करने लगेगी लेकिन यदि आप ₹300 रिश्वत देते हैं तो आपकी गाड़ी के सभी दोष नजरअंदाज किए जा सकते हैं. कल एक नेता जी इस रास्ते से गुजर रहे थे और रास्ते में जाम लगा था जिस वजह से पुलिस ने आज अतिरिक्त मुस्तैदी दिखा दी थी कई सारी गाड़ियांजब्त  कर ली थी.  गाड़ी के अंदर इतनी गर्मी थी और और उसके ऊपर से सड़के तो माशाल्लाह मैंने कहा इतनी खराब सड़कें तो मैंने कहीं नहीं देखी चंदशेखर ने कहा आप इन सड़कों को खराब कहते हैं इन सड़कों ने न जाने कितनों को बना दिया है इसका अंदाजा आपको नहीं है ।फूटी सड़कों और सीमित साधनों की मार झेल रहे यहां के नागरिकों के लिए इस तरह गाड़ियों का जप्त किया जाना चंदशेखर के शब्दों में हमारी यात्रा को ऐतिहासिक बनाने के लिए जिम्मेदार हुआ, हमारी यह ऐतिहासिक यात्रा रात्रि के 10:00 बजे समाप्त हुई जब हम संजय भैया के घर पहुंचे ।


     संजय भैया चंद शेखर के मौसेरे भाई हैं ।चंदशेखर ने अपने भइया से बाटी चोखा बनवाने के लिए कह रखा था तो रात 11:00 बजे हम बाटी-चोखा खाकर सोए ।अगली सुबह हम पहाड़ी की तरफ निकल आए यहां पर चंदशेखर मेरा लिखा कौसानी की यात्रा का संस्मरण पढ़ने लगे और मैं और सतीश इधर उधर टहल रहे थे सतीश भी चंद शेखर के छोटे भाई हैं ।चंद शेखर को मेरा लिखा संस्मरण बहुत पसंद आया उन्होंने कई फोटो पढ़ते हुए ही खिंचवाई यहां की सुंदरता का भरपूर पान करने के बाद और उसे तस्वीरों में कैद करने के बाद हम बैठकर बातें करने लगे चंदशेखर कह रहे थे हम लोग दिल्ली में बैठकर करते क्या है केवल इंटरनेट चलाते रहते हैं यदि गांव में इंटरनेट की व्यवस्था सही हो जाए बिजली की व्यवस्था ठीक हो जाए और किताबें आसानी से उपलब्ध हो जाए तो पढ़ने के लिए, यहां से ज्यादा शांत और अच्छा माहौल कहां मिलेगा. लौटते हुए हमने देखा कि एक स्थान पर पहाड़ों के बीच से पानी आ रहा है पहले हम सब ने पानी पिया, बहुत साफ पानी था.चंदशेखर पानी देखते ही भइस की तरह अपने आप को रोक नहीं पाते, नहाने के लिए मचलने लगे अब उन्हें रोक पाना मुश्किल था फिर मैं इधर-उधर घूम के तस्वीरें खींचता रहा है जबकि चंदशेखर नहाते रहे और सतीश बैठा रहा.  इसके बाद भी उन्हें यहां से चलने की इच्छा नहीं हो रही थी जबकि घर से दो बार फोन आ चुका था कि कहां चले गए तुम लोग घर पहुंचने पर उनकी मौसी बोली आटा लेत गईल होत और ओही जा लिट्टी लगा ले ले होत तो ठीक रहीत सुबह से निकलल हव बगैर कुछ खाए-पीए।चन्द्रशेखर की भाभी :-(संजय भैया की पत्नी:) आंगनबाड़ी कार्यकत्री हैं घर के सामने ही उनका केंद्र है हम लोग उसी मडई में बैठकर लाई चना खाने लगे बातें होने लगी ।बातों का मोर्चा संभाल रखा था चंदशेखर ने अंजेश भैया ने ।अंजेश भैया संजय भैया के छोटे भाई हैं ।संजय भैया बीच-बीच में अपनी राय दे रहे थे ।मैं और भाभी चुप थे हो सकता है कि वह कुछ कहती हैं तो कुछ बातचीत करने का अवसर मिलता पर मुझे अफसोस है कि मैंने उनसे कोई बातचीत नहीं की. उनके बनाए स्वादिष्ट भोजन के लिए उन्हें धन्यवाद भी नहीं दिया ।


    अपनी विभिन्न तरह की अच्छाइयों के बावजूद संयुक्त परिवार में लोकतंत्र का अभाव और संवाद का भाव एक बहुत बड़ी कमी है ।जिसके कारण उसकी अच्छाइयों पर से हमारा ध्यान हट जाता है ऐसा नहीं है कि एकाकी परिवार में लोकतंत्र और जीवन्त संवाद हो ही अभाव तो वहां भी हो सकता है ।वर्मा सर कहते हैं ,परिवार को जनतंत्र की बुनियाद पर खड़ा होना चाहिए अन्यथा परिवार टूटते बिखरते रहेंगे जहां कहीं भी लोकतंत्र का अभाव होगा और व्यक्ति की अहमियत नहीं होगी वहां वह ज्यादा समय तक टिका नहीं रह सकता।

     खाना खाने के बाद हम खेलने के लिए निकल आए ।तमाम सारे पुराने खेल जिन्हें हम भूलते जा रहे थे आज उन्हें फिर से खेले ।यहां जो जितना छोटा था उतना ही खेलने में तेज था सात पत्थरों को सजा कर उसे गेंद से मारने का खेल तो आपने खेला ही होगा इस से लेकर खो-खो तक हमने बहुत सारे खेल खेले और जब टांगों में दर्द होने लगा और जोरो की प्यास लग आई। तब हम वहां से हटे चंदशेखर से एक लड़के ने पूछ लिया अब कब आएंगे उन्होंने कहा एक साल बाद आएंगे तो फिर खेला जाएगा उन्होंने कहा शायद उन्हें नहीं पता है कि 1 साल में गंगा जमुना में सीवर का कितना पानी मिल चुका होगा, हो सकता है इनमे से कईलड़के रोजगार के लिए दिल्ली मुंबई सूरत और पंजाब का रूख करें हो । 1 साल का समय तो बहुत होता है परिवर्तन के लिए वह भी तब जब केंद्र और राज्य की सरकारें ही नहीं बल्कि सात समुंदर पार की शक्तियां भी लग गई हो आपका विकास करने के लिए, आप को स्मार्ट बनाने के लिए और आप को आप की जमीन से उजाड़कर दिल्ली मुंबई का प्रवासी बनाने के लिए ऐसे में साल भर का समय बहुत होता है ।

          इसके बाद हम पानी पी कर आम के बगीचे में खटिया पर सुस्ताने लगे यहां चंद शेखर ने अपनी एक फ़ेसबुक दोस्त शिल्पी का लिखा और गाया हुआ गीत सुनाया ।आ कर के जा चुके हो यह मानते हो क्या ? वह चाहते थे कि हम इसका जवाब लिखें और गा कर उन्हें भेजें मैंने यह गीत एक कागज पर नोट किया और जवाब की बात सोचने लगा थोड़ी देर हम मीर और ग़ालिब पर बात करते रहे और चंदशेखर की वर्तमान समय में लिखी जा रही ग़ज़लों के ऊपर ।इस तरह एक घंटा बीता और चंदशेखर को याद आया कि उन्हें अपनी बहन कंचन के यहां भी जाना है हम तीनों मैं सतीश और चंदशेखर उनके यहां पहुंचे शेखर के मुंह से कंचन की बहुत तारीफ सुनी है जैसे कि वह बहुत साहसी और निर्भीक लड़की है और भी इसी तरह की बातें पर मैंने जितनी कल्पना की थी उनको उससे ज्यादा ही पाया कम नहीं ।पानी पीने के बाद सभी शांत बैठे थे सोच रहे थे कि किस विषय पर बातें करें हाल ही मेंउनकी  उनकी सास का निधन हुआ था और बाकी लोग तो बाहर ही रहते थे घर पर उनके पति ससुर और उनकी बेटी ही बस थे पति और ससुर दुकान पर थे बेटी सो रही थी घर बहुत सुना सुना सा लग रहा था ।मैंने कागज कलम मांगा यह कहकर कि लाइए मुझे एक कविता लिखनी है ।उन्होंने हमें अपनी अंग्रेजी की नोटस पकड़ा दी ।मुझे कोई कविता नहीं लिखनी थी बल्कि अपनी आदत के अनुरूप मैंने एक चिट्ठी लिख डाली है उसे पढ़ने के बाद उनकी यह प्रतिक्रिया थी मुझे नहीं लगता था कि आप इतना शर्माते होंगे वह अभी तक मुझे अंकेश के बजाय चंद्रशेखर के एक अन्य मित्र अव्यक्त के तौर पर जा रही थी । इसके बाद उन्होंने कहा यह लिखने की कला आपको गॉड गिफ्टेड है लिखने की कला के बारे मेऔर अपने बारे में कुछ भी कहना और अपर्याप्त सा और गैर जरूरी सा लगता है इसलिए मैंने मुस्कुराकर काम चलाया यह कहते हुए कि पढ़ते-लिखते रहने से सब को आ जाता है कुछ भी गॉड गिफ्टेड नहीं है। चंद शेखर ने हाल ही में मूंग की चाट बनाना सीखा था तो वह उनकी चाट बनाने में लग गए चंदशेखर को याद आया कि आज 20 जून है और उनकी बहन कंचन की शादी की सालगिरह है वह चाट बनाकर दीदी और जीजा को अपने हाथ से ही खिलाने लगे और इसी मुद्रा में फोटो खींचने लगे ।चंदशेखर को आज ही घर पहुंचना था इसलिए इसके बाद हम लोग वहां से निकल आए शायद कुछ और देर रुकते तो  कुछ और अविस्मरणीय यादे साथ लाते पर  जो भी अपने हिस्से आई उन्हें ही बहुत मानते हुए हम बढ चले आगे की ओर ।

       चंदशेखर के घर पहुंचते पहुंचते 9:00 से अधिक हो गए थे लगभग सभी लोग खाना खा रहे थे ।बाहर बैठकर बातें हो रही थी परीक्षा के बारे में, मेरे बारे में ,मोदी और योगी के बारे में ,लगभग एक घंटा बितने वाले थे यू बातें करते हुए ।मैं सोच रहा था गांव के लोग तो जल्दी खाना खा लेते हैं फिर यह लोग खाना क्यों नहीं खिला रहे? बाद में जब खाना खाने गए तो पता चला उनकी मम्मी कह रही थी रोटी ठंडी हो गई थी ना इसलिए वह फिर से पकाने लगी थी खाना खाने के बाद बिस्तर पर लेटे लेटे  बातें करते हुए जाने कब सो गए पता ही नहीं चला ।अगली सुबह चंदशेखर ने मुझे इतने लोगों से मिला दिया और हम दोनों ने जगह-जगह कितना कुछ उदरस्थ किया कि इन सब का विवरण देना मुश्किल है और गैर जरूरी भी ।बस इतना कह दूं यदि आपने चंदशेखर को उनके गांव में नहीं देखा तो आप अभी चंदशेखर से पूरी तरह नहीं मिल पाए हैं।


 मैं सोच रहा था कि इस सन्समरण की शुरूआत इस प्रकार करूँ “चंद्रशेखर अपने गांव में” पर यदि मैं इस तरह लिखता तो बहुत कुछ छूट जाता लिखने से इसलिए इस तरह नहीं लिखा चंदशेखर के गांव में या संजय भैया के गांव में जातीय आधार पर विभाजन बड़ा स्पष्ट ढंग से नजर आ रहा था ।पहला दिन कोईरान के नाम रहा कोईरान मतलब जहां ज्यादातर मौर्य ,कुशवाहा जातियों के लोग रहते हैं ।दूसरे दिन हम कई दलितों के यहां गए ।उन्होंने हमारा बड़ी गर्मजोशी से स्वागत किया ।हाँलाकि कई दलित बहुत आशंकित से भी रहते हैं किसी की भी सहानुभूति उनके लिए शंका या संशय का विषय हो सकती है ।क्या करें बार बार उन्हें ठगा जाता रहता है जो थोड़े जागरुक हैं वह आशंका ग्रस्त रहते हैं ।एक दो महिलाएं तो इतनी खुशी से मिली  कहने लगी हमारे भैया आते हैं तो सब से मिलते हैं फिर अपना दुख सुख बताने लगी। मेरे आंसू छलक रहे थे जिन्हें किसी ने नहीं देखा। वहां एक शादी का निमंत्रण पत्र पढ़ा था जिस पर डॉक्टर अंबेडकर और अन्य दलित महापुरूषों की तस्वीरें थी जाने क्यु रमाशंकर सर की याद आ रही थी सोच रहा था यह हिस्सा तो उनको जरुर सुनाऊंगा जो लोग रमाशंकर सर को नहीं जानते हैं उनके लिए बता दूं कि रमाशंकर सर हम सब से काफी सीनियर हैं उन्होंने पंत संस्थान से “मुसहर जाति का इतिहास” इस विषय पर रिसर्च किया है इस के सिवाय वह और भी बहुत कुछ है और उनकी इन बातों को उनसे मिलकर ही जाना जा सकता है ।ऐसे नहीं ।यहां बैठे हुए मैं सोच रहा था आज डॉक्टर अंबेडकर के प्रशंसकों और अनुयायियों की संख्या बढ़ती जा रही है दलितों में संघर्ष की चेतना और जागरूकता बढ़ती जा रही है पर यह काम अधूरा ही रहेगा जब तक सवर्णों में पछतावे की भावना नहीं पैदा होती दलितों के लिए किए गए गांधीजी के प्रयासों को गलत बताया जाता है पर मैं यह समझता हूं कि अंततः तो हमें साथ ही साथ रहना है ।हक के लिए लड़ना तो जरूरी है पर मन में बैर रखना व्यक्तियों से द्वेष रखना इससे कोई समाधान नहीं निकलने वाला और बैर और द्वेष रखने की भावना सवर्णों की ओर से ही अधिक है ।हम उनके यहां गए तो उन्होंने हमें कप में बहुत बढ़िया चाय पिलाई ।वही यदि वे  हमारे यहां आए तो हम उन्हें पहले तो पानी भी नहीं पिलाएंगे और पिलाएंगे तो उस बर्तन को अलग रखेंगे ।गांव के लोगों के बीच इस विभाजन की बात मैंने चंद शेखर से कही तो उनका कहना था मेरी दृष्टि मे प्रधानी का चुनाव सबसे अधिक जिम्मेदार है इस विभाजन के लिए ।मैंने कहा एक रिसर्च इस विषय पर भी होनी चाहिए कि प्रधानी का चुनाव किस तरह से गांव के लोगों के बीच विभाजन के लिए जिम्मेदार है ।घर पहुंचने पर चंदशेखर के बाबा उन पर बिगड़ने लगे जब उन्हें पता चला कि अमुक के यहां से पूरी खा कर आ रहे हैं उन्होंने कहा है चमरा कि यहां से पूरी खा कर आ गए ।चंदशेखर ने उनसे तो कुछ नहीं कहा पर अंदर आकर कहा कि कल कमला के यहां से मुर्गा भी खा कर आऊंगा फिर देखता हूं कि आप लोग हमें किस बर्तन में खाना देते हैं ।

       चंद्रशेखर ने पूरे गांव को ही अपना परिवार बना रखा है और उन्हें बिल्कुल भी फर्क नहीं पड़ता है कि उनके परिवार वाले उन लोगों के बारे में क्या राय रखते हैं ।उनकी कोशिश रहती है कि सबसे अच्छे संबंध रहे ।वह बड़ी दिलचस्पी लेकर हर एक आदमी के बारे में बता रहेथे।जैसे राजित बाबा बहुत बड़े स्टोरी ट्रेलर हैं और हरएक कहानी में अंत तक सस्पेंस बरकरार रखते हैं इसी तरह का रामनाथ बाबा की कुछ विशेषता है तो नगीना बाबा की कुछ और। चंदशेखर जितनी दिलचस्पी ले कर बता रहे थे इतनी दिलचस्पी लेकर वह लिखतें तो “ मैला आंचल” या “इन्हीं हथियारों से जैसी एक और कृति बनकर तैयार हो जाए पर कोई बात नहीं लिखने का काम तो मेरा है ।हमें उनसे यह अपेक्षा है की वह कोई फिल्म बनाएंगे इस विषय पर देखिए ऐसा कब हो पाता है? इस बीच हम उनकी बुआ के घर गए यहां पर बातें करने से फुर्सत होने के बाद मै ,चंदशेखर रंजना और रिंकू बैठकर लूडो खेलने लगे अब कोई भी सोच सकता है कि यह आदमी इतनी दूर से चलकर लूडो खेलने आया है और बच्चों के साथ चिप्पी खेलने के लिए ।पर ऐसा ही होता है । मेरा एक बहुत प्रिय गाना है जिसे हम दोनों अक्सर गाते रहते हैं । “दिल ढूंढता है ,फिर वही, फुर्सत के रात दिन” .फुर्सत का दिन हो और अपने किसी प्रिय का साथ हो बस इतना ही जरूरी होता है, फिर आप साथ में लूडो  खेलिए या साथ में खाना पकाइये  सब कुछ अच्छा लगता है ।


        दूसरे दिन शाम को हम चंदशेखर का पाहीवाला घर देखने के लिए निकले ।जहां झरना बहता है और बहुत सुंदर नजारा होता है और रास्ते में ही जयकर कला के पास परमहंस आश्रम के पास रुक गए ।यहां एक बाबा जी से मिलने के लिए ।वह पढ़े लिखे नहीं हैं पर दर्शन के विषय में अच्छी समझ रखते हैं और उन्हें उन्हें कोई नहीं मिलता बात करने के लिए। गोड़े गिरने वाले लोगों की संख्या बहुत ज्यादा है और सभी लोग इस अपेक्षा से आते हैं कि बाबा के आशीर्वाद से हमारा यह काम बन जाएगा और वह काम बन जाएगा पर जब मोह से ही छुटकारा नहीं है तो बाबाजी की बात क्या समझ आने वाली है? यह भी बहुत बढ़िया जगह थी। पास पास पड़े हुए बड़े बड़े पत्थर ऐसा लगता है मानो आमंत्रित कर रहे हो बैठने के लिए और बहस करने के लिए ।


        मैंने कहा पहाड़ों की शांति का ज्ञान और साधना से जरुर संबंध रहा है ।ज्ञान और बहस की बात चली तो जेएनयू की याद आ गई। मैंने कहा इन पहाड़ों पर भी एक यूनिवर्सिटी होनी चाहिए JNU जैसी यूनिवर्सिटी के स्वरूप को लेकर हमारे बीच वाद-विवाद चलता रहा चंदशेखर कुछ भी करें ।उसमें एक पात्र मै जरूर होता हूं तो यहां भी कुछ महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां मेरे लिए निर्धारित की गई पर विश्वविद्यालय का स्वरूप अभी निर्धारित नहीं हो पा रहा था ।चंदशेखर कह रहे थे कि ज्ञान स्वायत्त होना चाहिए उस पर रोजगार का या किसी भी और बात का दबाव नहीं होना चाहिए वही मै एकेडेमिक रिसर्च और सेमिनारों के माहौल से उबा हुआ हूं और मैं कह रहा था कि आने वाला समय इस बात का नहीं है कि ज्ञान स्वायत्त हो  और ना ही हम शीत युद्ध के दौर में जी रहे हैं जहां विचारधाराओं का टकराव हो इसलिए जेएनयू का स्वरूप अब प्रासंगिक नहीं है बहस अब और ज्यादा आगे नहीं बढ़ी चंद शेखर एक  पत्थर पर बैठकर ध्यान लगाने लगे मैं इधर उधर टहल रहा था जब टहलने से उब गया ।तब मैं भी ऐसा ही करने लगा चंद्रशेखर का ध्यान समाप्त हुआ तो मैंने कहा ना जाने क्यों मुझे तो अपने लिए यह वक्त की बर्बादी लगता है ।उन्होंने कहा अब यह जरूरी तो नहीं कि हर एक आदमी ध्यान लगाए ही पहले कहा जाता था ।जो भी करो ध्यान से करो कोई भी काम ध्यान से किया जाए तो वही ध्यान है ।मुझे उनकी बात अच्छी लगी और मैने उन्हें बताया कि विनोबा ने भी ऐसा ही कहा है। बस अंतर यह है कि उन्होंने ध्यान से ज्यादा अहमियत राम को दे दी है अपनी बात में उनका बोलना जारी रहा उन्होंने कहा तुम जो इतना इतना लिख देते हो यह भी एक ध्यान है ।अब अंधेरा होने वाला था इसलिए हम वापस लौट  आए ।चंदशेखर ने कहा लड़कियों को जितनी छूट शहरों में मिलती है उतनी ही हमें यहां गांव में मिलती है ।मैंने कहा आप समय से नहीं जाएंगे तो क्या होगा? क्या होगा ,कहेंगे आवारा हो गया है ?अगले दिन चंदशेखर ने महुआ की पूरी खाने की इच्छा जाहिर की उनकी मम्मी ने मुझसे पूछा कि क्या तुमने खाया है इसे ।मैंने कहा ,मैंने प्रोफेसर तुलसीराम की आत्मकथा में इसके बारे में पढ़ा है पर खाया नहीं है उन्होंने कहा कि बताइए अब इन सब बातों का इतिहास लिखा जा रहा है और लोग किताबों में पढ़ रहे हैं फिर वह बड़े उत्साह से इसे बनाने में जुट गई ।यह काम शाम को तीन 4:00 बजे से शुरू हुआ था और बहुत देर रात तक चला चंदशेखर की बहने परात भर आटे की पूरियां काफी देर तक तलती रही ।मैं चाह रहा था कि उनकी थोड़ी मदद करूं। वैसे भी मेरी आदत है कि मैं जब घर पर रहता हूं उन दिनों को छोड़कर लगभग सभी दिन आटा गूंथकर रोटी बनाता हूं पर यहां मदद करने की गुंजाइश नहीं थी एक तो उनका किचन बाहर था और पास ही उनके दादा दादी और भी कई लोग बैठे थे अब उनके सामने काम करते हुए मुझे भी  असहज लगता और उन्हें भी काम कराने में असहजता होती। एकाकी परिवार में यह बढ़िया बात है कि आप अपने घर में कुछ भी करें कोई पूछने नहीं आ रहा पर यहां तो घर जितना अंदर होता है उतना ही बाहर भी फैला होता है ।


       यहां 3 दिनों में हमने क्या क्या खाया पूछिए मत? चंदशेखर कभी कभार उबकर कहते थे खाना यहां ऐसे खिलाया जाता है जैसे सजा दी जा रही हो इस पर मैंने कहा अरे भाई हमें और आपको कविता लिखना आता है तो हम कविता लिख लिख कर अपना प्रेम प्रकट करते रहते हैं । इन्हें यह नहीं आता तो यह लोग खाना खिला खिला कर ही अपना प्रेम प्रकट करते हैं वैसे तो यह संस्मरण अब समापन की ओर है पर फिर भी बहुत सी बातें छूट रही हैं जैसे कि मैं आपको यह नहीं बता पाया कि चंदशेखर कि अपने गांव में किस प्रकार की छवि है । विस्तार में नहीं जाना चाहूंगा सिर्फ एक उदाहरण से समझने की कोशिश करते हैं कभी कभार मै चंदशेखर से कहता हूं छोड़िए यह सब तैयारी वैयारी ।अपने मन का कुछ काम कीजिए ।यहां आकर मैंने उनसे कहा, यहां तो लोग आपसे इतनी अपेक्षा लगाए हुए हैं कि आप आईएएस बनेंगे,गांव और समाज का नाम रोशन करेंगे ।कहीं गलती से भी आपने छोड़ने की बात सोची तो सब मिलकर के आपको बहुत मार मारेंगे । दुनिया के लिए सफलता के ,तरक्की के ,जो मायने हैं हमारे लिए भी। तरक्की सफलता और खुशी के मायने वही हो ऐसा नहीं है ।देखिए आगे क्या होता हैं?

                                ___अंकेश मद्देशिया

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