आख़िर यह जिंदगीनहीं तो क्या?
पेट भरकर खाए मीठा पान बातें की वैचारिक, बौद्धिक खुश हुए गंगा किनारे सरसों के पीले फूलों को देखकर और दु:खी भी हुए गंगा-जल देखकर चिंता व्यक्त की आज की अंधश्रद्धा पर बातें की मार्क्सवाद, स्वच्छंदतावाद की, मंसूबे बांधे भविष्य के सामाजिक कार्यों की रूपरेखा बनाई घरौंदे बनाये रेत के किसानों से मिले खेत में। मादरे हिंद की बेटियों से मिले और केदार की चाय पीकर लौट आये अपने-अपने आशियाने। आख़िर यह ज़िंदगी नहीं तो क्या? ~ प्रशांत साल 2012 का कोई दिन.