न्याय की देवी
वह मानता था की न्याय की देवी केवल अंधी ही नहीं होती बल्कि नंगी भी होती है .इसलिए उसने अपने कोर्ट में न्याय की देवी की अंधी और नंगी प्रतिमा लगवाई .यह बात लोगों लोगों को नहीं पची कुछ ने विरोध किया कुछ ने उसके पुतले पर कालिख पोती कुछ ने उसके खिलाफ घृणा फैलाई कुछ ने उसे धमकी दी लेकिन उसने उस प्रतिमा को नहीं बदला और न ही कपडे पहनाए उसे नग्न ही रहने दिया .कुछ दिन तक ऐसा ही चला एक दिन एक सिरफिरे ने उसकी हत्या कर दी .उसके हत्या को छुपा के रखा .लोगों को पता ही नहीं चला की वह मर गया है. सन्नाटा छाया रहा किसी को कानों में भनक तक नहीं लगी.लेकिन कानून का का तेराजू एक तरफ झुक गया कुछ दिन बाद उसके स्थान पर दुसरे को बिठाया गया सब माहौल वैसा ही था वही मुजरिम वही वकील और वही गवाह वही दर्शक वही बस उस न्याय की मूर्ति को कपडा पहना दिया गया था और उसके आंख से पट्टी हट गयी .वह फैसला सुनाता रहा लकड़ी का हथौड़ा आवाज करता रहा और न्याय की देवी के आँखों से आंसू बूंद-बूंद गिरता रहा....