इतनी व्यस्ततवों के बावजूद भी रविवार का दिन कितना सुकून देता है .जिस प्रशाशनिक सेवा की तैयारी मैं कर रहा हूँ उसमें जाने के बाद भी रविवार का कोई वजूद नहीं रहेगा . शायद यह बचपन की वजह से है बचपन में जब हम शक्तिमान धारावाहिक का इंतजार दिलचस्पी के साथ करते थे ,न देख पाने के कारण एसा लगता था जैसे कि रविवार जैसे आया ही न हो .आज भी रविवार का इंतजार रहता है जब की सारे दिन एक से हो गये हैं .रविवार की खुमारी शनिवार के शाम से चढ़ती जब थोड़ी देर बाद सोने की इच्छा होती है रविवार के दिन जग जाने के बाद भी थोड़ी देर बेड पर ही पड़े रहना यह रविवार की निशानी है .दिन भर हर काम को थोडा स्लो मोशन में करना .और बार बार फोन के कांटेक्ट सूची में देखना कि किससे बात की जाय .ये सब रविवार के दिन होता है .पता नहीं क्या है इस रविवार में .घर से भी फोन इसी दिन आता है क्योंकि उनके मन में भी यह बात बैठ चुकी है कि रविवार के दिन कम व्यस्त रहता होगा जबकि रविवार का दिन ज्यादा व्यस्त हो जाता है क्योंकि हप्ते भर के टाले गये काम सब रविवार को ही इक्कठे होते हैं . ...