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अप्रैल 30, 2017 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

यादों की नाव

बचपन में हम बर्षा के दिनों में पानी में नाव चलाया करते थे नाव पर एक चींटा बैठा दिया करता था यह सोच कर की वह नाव चलाएगा नाव पानी की धरा में बह निकलती थी और हम खुश होते थे कि नाव चींटा चला रहा है खैर वह बचपन के दिन थे... आज भी जब फुरसत के पलों में मन की तरंगों पर यादों की नाव चलता हूँ उसपर तुम्हारे साथ गुजरे कुछ पलों को बैठा  देता हूँ धीरे धीरे नाव आगे बढती है मैं मगन होता हूँ कि नाव तुम्हारे यादों से पतवार से चल रही है ...

दिन एक रविवार का

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इतनी व्यस्ततवों  के बावजूद भी रविवार का दिन कितना सुकून देता है .जिस प्रशाशनिक सेवा की तैयारी मैं कर रहा हूँ उसमें जाने के बाद भी रविवार का कोई वजूद नहीं रहेगा  . शायद यह बचपन की वजह से है बचपन में जब हम शक्तिमान धारावाहिक का इंतजार दिलचस्पी के साथ करते थे ,न देख पाने के कारण एसा लगता था जैसे कि रविवार जैसे आया ही न हो .आज भी रविवार का इंतजार रहता है जब की सारे दिन एक से हो गये हैं .रविवार की खुमारी शनिवार के शाम से चढ़ती जब थोड़ी देर बाद सोने की इच्छा होती है रविवार के दिन जग जाने के बाद भी थोड़ी देर बेड पर ही पड़े रहना यह रविवार की निशानी है .दिन भर हर काम को थोडा स्लो मोशन में करना .और बार बार फोन के कांटेक्ट सूची में देखना कि किससे  बात की जाय .ये सब रविवार के दिन होता है .पता नहीं क्या है इस रविवार में .घर  से भी फोन इसी दिन आता है क्योंकि उनके मन में भी यह बात बैठ चुकी है कि रविवार के दिन कम व्यस्त रहता होगा जबकि रविवार का दिन ज्यादा व्यस्त हो जाता है क्योंकि हप्ते भर के टाले गये काम सब रविवार को ही इक्कठे होते हैं .        ...

बातें ...

   ख़तम नहीं होती हमारी बातें ... हमरी बातें नहीं खतम होती ख़तम होता है तो बस मोबाइल का बैलेंस नहीं खत्तम हो पाती हमारी बातें खतम होते हैं कुछ  रस्ते नहीं ख़तम होती है हमारी बातें ख़तम हो जातीं है रातें हमने सोचा कि चलो आज खत्म करदें बातों को  सदा के लिए लेकिन बातें तो चलती रहीं पर ख़त्म हो गयी बातें ख़त्म करने की चाहत , हमारी बातें नहीं खतम होतीं ख़तम तो हो जाती बस प्रेम ना मिल पाने  की पीड़ा हमारी बातें खतम नहीं होतीं बस सूख जाते हैं आंसू खुद को समझे जाने के आस  में जो बहे थे . ख़तम तो नहीं होती हमारी बाते बस कुछ कविताएँ खतम हो जाती हैं . अपने पढ़े जाने के इंतजार में ...

खिड़की

                      खिड़की .... एक खिड़की वह जो हवा आने देती है एक खिड़की वह जो सुबह कोमल किरणों को घर में फैला देती है एक खिड़की वह जिसमें हम बरसात देखा करते थे पेड़ों को झूमते पपीहे को भीगते देखा करते थे एक खिड़की वह जिसमें हम देखा करते थे उसे  और वह भी तिरछी निगाहों से हमें  एक खिड़की वह भी जहाँ हमने उदासी के कुछ पल काटे थे लिखे थे कुछ गजल एक खिड़की वह भी जहाँ गौरईया आ कर बैठती थी और पाकर के पेड़ की डाली पर बुलबुल दिख जाया करती थी . एक खिड़की और जिसके सामने बैठ सोचा करता था उसकी कहीं बातों को एक खिड़की वह जिसमें कोई चिट्ठी छोड़ जाता था जिसको अचानक देख दिल धक् से कर जाता था एक खिड़की वह भी जिसमें लालटेन की रौसनी और झींगुरों की आवाज आती थी ये खिड़कियाँ कितनी प्यारी होतीं थी न अन्दर से मैं झाकता था बाहर  और बाहर से कोई मुझे आज भी एक खिड़की जिसमें हम लोग झाकतें हैं और कोई उसी खिड़की से हमारे जेब में झाकता है .