खिड़की
खिड़की ....
एक खिड़की वह जो
हवा आने देती है
एक खिड़की वह जो सुबह
कोमल किरणों को घर में फैला देती है
एक खिड़की वह जिसमें हम बरसात देखा करते थे
पेड़ों को झूमते पपीहे को भीगते देखा करते थे
एक खिड़की वह जिसमें हम देखा करते थे उसे
और वह भी तिरछी निगाहों से हमें
एक खिड़की वह भी
जहाँ हमने उदासी के कुछ पल काटे थे
लिखे थे कुछ गजल
एक खिड़की वह भी जहाँ गौरईया
आ कर बैठती थी
और पाकर के पेड़ की डाली पर
बुलबुल दिख जाया करती थी .
एक खिड़की और जिसके सामने बैठ सोचा करता था
उसकी कहीं बातों को
एक खिड़की वह जिसमें कोई चिट्ठी छोड़ जाता था
जिसको अचानक देख दिल धक् से कर जाता था
एक खिड़की वह भी जिसमें लालटेन की रौसनी
और झींगुरों की आवाज आती थी
ये खिड़कियाँ कितनी प्यारी होतीं थी न
अन्दर से मैं झाकता था बाहर
और बाहर से कोई मुझे
आज भी एक खिड़की
जिसमें हम लोग झाकतें हैं और
कोई उसी खिड़की से हमारे जेब में झाकता है .
एक खिड़की वह भी
जहाँ हमने उदासी के कुछ पल काटे थे
लिखे थे कुछ गजल
एक खिड़की वह भी जहाँ गौरईया
आ कर बैठती थी
और पाकर के पेड़ की डाली पर
बुलबुल दिख जाया करती थी .
एक खिड़की और जिसके सामने बैठ सोचा करता था
उसकी कहीं बातों को
एक खिड़की वह जिसमें कोई चिट्ठी छोड़ जाता था
जिसको अचानक देख दिल धक् से कर जाता था
एक खिड़की वह भी जिसमें लालटेन की रौसनी
और झींगुरों की आवाज आती थी
ये खिड़कियाँ कितनी प्यारी होतीं थी न
अन्दर से मैं झाकता था बाहर
और बाहर से कोई मुझे
आज भी एक खिड़की
जिसमें हम लोग झाकतें हैं और
कोई उसी खिड़की से हमारे जेब में झाकता है .
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