कौसानी की यादें

   इस यात्रा की शुरुआत से पहले ही मुझे इस बात पर आश्चर्य हो रहा था कि अंकित जी और मैं एक सप्ताह या दस दिन तक साथ रहेंगे । इससे पहले तो होता यह रहा है कि जब तक किसी बात पर सोच विचार कर अपनी बात कहने जाता हूं तब तक वह किसी दूसरी बात पर पहुंच जाते हैं । मैं हर काम इत्मिनान से मजे लेकर करना चाहता हूं और वह एकदम जल्दी से निपटा देना चाहते हैं । इस तरह का विरोधाभास है हमारे बीच, पर विरोधाभास हमेशा ही टकराव की ओर ले जाए यह जरुरी नहीं, बल्कि यह हमें पूर्णता की ओर भी तो ले जाता है। इस तरह इस यात्रा के बाद हमारे बीच काफी निकटता हो गई। बस समझ लीजिए कि हमने साथ बैठकर प्यार मोहब्बत की बातें नहीं की और साथ में आंसू नहीं बहाये बाकी जो कुछ भी किया जा सकता है वह सब तो किया ही। बल्कि संयोग से वापस लौटते वक्त हमें एक ही बर्थ में एडजस्ट करते हुए आना पड़ा। उम्मीद है कि यह  संबंध आगे भी ऐसे ही बना रहेगा और बढ़ता रहेगा ।
याद आ रहा है कि अंकित जी रात में टी शर्ट और हाफ पैंट के साथ टोपी लगाए बिल्कुल टूरिस्ट मालूम पड़ रहे थे। वहीं सुबह हल्द्वानी के बस स्टैंड के पास उन्होंने पेपर बिछा कर उस पर पालथी मारकर बैठने के बाद जिस तरह पूड़ी और अचार खाया, बिल्कुल ही देसी आदमी मालूम पड़ रहे थे। कमाल है कि दोनों तरह के रोल में बड़ी आसानी से आवाजाही कर लेते हैं। मुझसे तो यह नहीं हो पाता है, पर पूड़ी और अचार खाने में मैंने उनका अनुसरण किया । क्या करें? आखिर यह पेट का मामला था।
इसके बाद हल्द्वानी से कौसानी का बस से छह घंटे का सफर था । बस में बैठे हुए हमें झूले में बैठे होने का एहसास हो रहा था। उस झूले की सैर कभी आप खुद भी कर आइएगा , मैं क्या कहूं इस बारे में । बस में ही एक सहयात्री मिले थे, हमने उनसे कौसानी के बारे में पूछा, उनका जन्म कौसानी में ही हुआ था, अपनी ज़िंदगी के सत्तर वर्ष कौसानी में बिता देने वाले हमारे सहयात्री ने कौसानी को 'स्वर्गिक आनंद' की जगह कहा और अगले चालीस वर्ष और कौसानी में रहने की इच्छा जाहिर की। उनकी बातें सुनकर मेरे और अंकित जी के बीच में 'स्वर्गिक आनंद' को लेकर विनोद की स्थिति आती रहती थी, अंकित जी बीच बीच में कुछ कुछ बातों को स्वर्गिक आनंद से जोड़ देते थे जो हमारे लिए ठहाके का विषय बन जाता था।
काफी चढ़ाई चढ़ने के बाद हम रवींद्र जी के घर पर पहुंचे, पहुंचने के बाद वर्मा सर ने गले लगा लिया । अंकित जी तो भरपूर गले मिले और मैं शरमाता सकुचाता रहा और हाथ जोड़कर नमस्ते करके ही अंदर आ गया । अंदर आते ही अंकित जी ने एक एक कर सारा सामान बाहर निकाल कर , बताना शुरू किया कि सर ये लाया हूँ, और ये, और ये भी । और मैं अपनी आदत के अनुरूप इस कदर चुपचाप बैठा था। जैसे मैं वहां हूं ही नहीं। मैं अपने घर में भी इस कदर चुपचाप और दबे पांव से जाता हूं कि जैसे मेरा घर ना हो । और मैं कोई चोरी करने आया होऊँ । पता नहीं मुझे तो यही लगता है कि मैं किसी को डिस्टर्ब ना करूं । किसी की शांति भंग ना करूँ। इसी विचार से इतने दबे पांव से कहीं भी जाता हूं । इस बीच वर्मा सर बार बार यह कह रहे थे क्या तुम लोगों को भूख नहीं लगी है? नींद आ रही हो तो सो जाओ । भूखे होने पर मैं तो कभी भी खाना खा सकता हूं इसलिए मैं उठा और नहाने चला गया । खाने की मेज पर दाल चावल रोटी और करेले की सब्जी थी और खाने वाले थे हम दोनों।
वैसे ही हम इलाहाबादी छात्रों का यह नियम है कि जब खाना मिले तो ऊँट की तरह से जम के खाओ पता नहीं फिर कितनी देर इंतजार करना पड़े, हमारे बाद कोई खाने वाला भी नहीं था। इसलिए हम पूरा खाना समाप्त करके उठे ।
बरसात हो जाने के कारण ठंड बढ़ गई थी। यहाँ इस घर पर श्वेता जी और दिव्या जी नाम की दो लड़कियां मौजूद थी, जो भारती मैम के साथ जबलपुर से आईं थी । भारती मैम, रविंद्र शुक्ला जी की पत्नी हैं और रवींद्र जी , वर्मा सर के अभिन्न मित्र। भारती मैम ने हिंदी साहित्य की पढ़ाई की है और वर्तमान में हिंदी साहित्य पढ़ाती हैं, और रवींद्र जी ने कभी इंजीनियरिंग की पढ़ाई की थी, फ़िलहाल अभी उन्हें दार्शनिक के रूप में लोग जानते हैं, वो क्या हैं उनके द्वारा ये खोज अभी जारी है।
भारती मैम, श्वेता और दिव्या को दो दिन बाद ही यहाँ से चले जाना था । इसलिए ये लोग जल्दी ही कौसानी के प्रमुख दर्शनीय स्थल देख लेना चाहती थी । इसी दिन इन्होंने पास में ही स्थित अनासक्ति आश्रम देखने की योजना बनाई थी । हम भी साथ हो लिए।  ठंड और धुंध बढ़ जाने के कारण स्वेटर भी पहनना पड़ गया । अभी कल ही हम इलाहाबाद में 45 डिग्री के तापमान में अनवरत पसीना बहा रहे थे और यहां आकर स्वेटर पहनना पड़ रहा है, निराली है प्रकृति की माया।
यहाँ विभिन्न प्रांतों के लोग आश्रम देखने आए थे। कुछ बंगाली परिवार भी थे। उनमे एक पांच साल का बच्चा, जो अपने हमउम्र साथी से कह रहा था, यह देख गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर। इसी तरह एक बंगाली परिवार को यह बातें मैंने करते हुए सुना कि नेहरू ने चालाकी से सुभाष बोस को परिदृश्य से बाहर कर दिया और खुद प्रधानमंत्री बन गए। त्रिपुरी कांग्रेस में बोस के साथ जो हुआ, बातें इस पर भी हो रही थी । यह छोटी सी घटना दो बातें स्पष्ट करती हैं, पहली तो यह कि किस तरह बंगालियों में जातीय अभिमान की भावना भरी रहती है,  वहां का बच्चा भी रविंद्रनाथ टैगोर पर गर्व कर रहा है, वहीं ऐतिहासिक घटनाओं की गलत सलत व्याख्या करने या मन मुताबिक व्याख्या करने का जो रोग हमारे समय में लग गया है उस ओर भी इशारा कर रहा है। नेहरू और बोस ने कभी इस प्रकार की कटुता अपने मन में नहीं लाई होगी जितना उनके अनुयायी एक दूसरे के प्रति रखते हैं। वहां पहुंचने के थोड़ी देर बाद बरसात शुरु हो गई। हमने एक चाय की दुकान में आश्रय लिया, दुकानदार ने भाजपा का झंडा लगा रखा था, पर थोड़ी देर की बातचीत के बाद जब उसे यह भरोसा हो गया कि यहां कोई मोदीयाया हुआ नहीं है तब वह प्रधानमंत्री मोदी और उनके नोटबंदी के फैसले की जमकर लानत-मलामत करने लगा।
यह हमारे समय का एक अजीब रोग है। जिससे भी बात कीजिए पहले तो वह देश में हो रहे विकास कार्यों की तारीफों के पुल बांधता है पर जब उसे सामने वाले पर भरोसा हो जाता है कि अमुख आदमी भक्त नहीं है तब वह अपनी दुख तकलीफ बयां करने लगता है। इससे यही तो पता चलता है कि पहले सरकारें जनमत या जनसमर्थन पर चलती थी पर अब हमारे रहनुमाओं ने भय और आतंक की राजनीति का रास्ता अख्तियार किया है। सभी परेशान हैं पर सभी चुप हैं, भक्तों का तो कहना ही क्या? उन्होंने तो दिमाग में ताला लगाकर चाबी मोदी जी को सौंप दी है। उनकी इच्छा जब भी करें ताला खोल कर जो भी कूड़ा कचरा भरना चाहें भर दें।
भय की राजनीति का ही इसे उदाहरण माने कि हम जितना भी घूमे हमें कहीं भी विपक्षी पार्टी का एक भी झंडा नहीं दिखा। क्या सभी लोग सत्ता पक्ष से और उसकी पार्टी से एकमत हो गए हैं?
वाह रे मेरे जादूगरों, जो काम नेहरू जैसे लोकप्रिय प्रधानमन्त्री नहीं कर पाए, वह काम तुमने कर दिखाया, सलाम है तुम्हारी इस भय और आतंक की राजनीति को । विचारधारा का अंत तो पहले ही कर दिया था तुम लोगों ने । अब झंडा और अन्य प्रतीकों को भी गायब कर दिया आप सबने।
गरमा गरम बातचीत के बीच हमने दो तीन कप चाय पी डाली और गरमा गरम पकोड़े खाए। चलते चलते मेहरा जी ने हमें एक बड़ा सा बिल भी पकड़ाया , जिसमें प्रति चाय उन्होंने 15 रुपए वसूले और सफाई पेश की कि यहां पहाड़ों पर ट्रांसपोर्टेशन बड़ा महंगा है इसलिए चीजें महंगी हो जाती हैं, इस तरह उनकी इस महँगी चाय को पूरी यात्रा भर हम नहीं भूल पाए और कहीं भी चाय पीने से पहले अब हम दाम पूछना नहीं भूलते थे। इसके बाद घर पहुंचने पर हम वर्मा सर से बातचीत करने लगे। अंकित जी अपने उन सवालों को रखने लगे जिन पर चर्चा करने के लिए वह यहां तक आए थे , उनके बीच की स्पष्ट वार्ता को देखकर मैंने भी अपने प्रश्नों को लिख लिया ताकि समय मिलने पर सर के साथ उन पर चर्चा कर सकूँ।
दूसरे दिन रवींद्र जी,भारती मैंम, दिव्या जी और श्वेता जी सुबह ही कहीं घूमने चले गए। और हम बाजार की तरफ चले गए सामान लाने। दूध , हरी सब्जियां और अन्य जरुरी सामान हम लाये। सब्जियों में लौकी ही एकमात्र ऐसी थी , जो स्थानीय थी । बाकी सब मैदानों से आई थी।
दुकानदार ने हमसे कहा कि यह गर्म पानी की लौकी है ।अब इस गर्म पानी की लौकी को गलाने के लिए हमें कितने पापड़ बेलने पड़े। हम क्या बताएं ? फिर भी नहीं गली और हमें इसे ऐसे ही खाना पड़ा। अपनी आदत के अनुरूप हम ने जमकर खाना खा लिया। और बाकी लोग जब आएंगे तब खाना बनेगा यह सोचकर इत्मिनान हो गए कि अरे भई यह लोग खाना खाने वाले लोग थोड़े ही हैं। हम लोगों की तरह जो दो टाइम खूब जमकर खाना खाते हों । यह तो खाते रहने वाले लोग हैं । जो खाते रहते हैं। भोजन पर निर्भर नहीं रहते । बस खाते रहते हैं। कुछ ना कुछ। उसके बाद हमें नींद आ गई और यह मासूम सी खता हो गई कि उन लोगों का जो खाना 4:00 बजे खाना था , उन्होंने 8:00 बजे खाया और हम पर यह आरोप भी लगा दिया की देखिए यहां यूपी और एमपी की बात आ ही गई । बड़ा अफसोस भी हो रहा था । पर यह भी लग रहा था कि यह बातें मजा लेने के लिए कहीं जा रही हैं । हमने उन्हें दाल भात चोखा रोटी का भोजन कराया । इसबीच चोखा बनाने के लिए आलू में हम जब अचार का मिर्चा मिला रहे थे। तब श्वेता जी ने कहा ,आप लोगों के यहां जो सत्तू की पूड़ी बनती है । वह बहुत कमाल की होती है। फिर हमने कहा ऐसा है क्या ? फिर तो हम कल ही बनाते हैं इसे। प्रायश्चित भी तो करना था । रविंद्र जी ने इस बीच सत्तू भी हाजिर कर दिया। हम पूरे मनोयोग से लग गए इसे बनाने में । खाना खाने के बाद सभी 'अनारकली ऑफ़ आरावली' फिल्म देखने लगे । मैं सत्तू को भूनकर उसमें नमक मिर्च और जरुरी चीजे मिलाने में लगा रहा । उन लोगों का बार-बार यह कहना कि अरे कितने मन से बना रहा है । यह मेरा मनोबल ही बढ़ाता रहा। वैसे भी आजकल खाना बनाना, गाना गाना और कविता लिखना तीनों मुझे  बराबर ही प्रिय हैं।
सुबह हम बैजनाथ नाम के एक मंदिर को देखने गए । जो नागर शैली में 9 वीं सदी में बना था। इसकी मूर्तियां संग्रहालय में रखने लायक थी। चोरी हो जाने के कारण मूर्तियों को हटा दिया गया था। रवींद्र जी बता रहे थे कि यहां एक मूर्ती इतनी खूबसूरत थी कि मैं घंटों से उसे देखता रहता था। दो तीन साल पहले यहां के पुजारियों ने उसे कपड़े पहना दिए। इतने मूर्ख हैं ये लोग। इस पर वर्मा सर का कहना था क्या करें? उन्हें खुद पर भरोसा ही नहीं है। सब की समवेत हंसी फूट पड़ी। यहां पर एक जल स्रोत है उसका पानी खूब साफ रहता था, इतना कि उसमें मछलियां नजर आती रहती थी, पर उसके ऊपर बिजली उत्पादन की इकाई लगाकर उसको गंदा करने और मछलियों को समाप्त करने का काम प्रशासन ने किया है ।यहां बैठ कर सबने हमारी बनाई सत्तू की पूरी या घाटी खाई और खूब प्रशंसा की। वर्मा सर ने कहा अरे अंकेश इतनी प्रशंसा बटोर कर क्या करोगे ऐसा करो बोल ही दो, हमने कहा क्या सर? सर हंसने लगे और बोले कि लगता है इसने भी किसी से अब तक नहीं कहा है! उनका इशारा प्रेम निवेदन की तरफ था। मैं इतना संकोची इंसान एकदम से कैसे इतना मुंहफट हो जाऊं तो मैंने मूर्खता में ही शरण पाई और अनजान बना रहा । दूसरे की बात चल रही हो तो उसमें मजा लेना बड़ा आसान होता है। इससे कुछ समय पहले ही वर्मा सर ने उन दोनों लड़कियों से पूछा था अब तक कितने लड़कों ने तुमसे कहा है? उनकी ओर से कोई जवाब नहीं आ रहा था तो मैंने ही कमेंट कर दिया इन्होंने गिना ही नहीं!! मेरा यह यह कमेंट सबको हंसाने के लिए पर्याप्त था। वर्मा सर भी कमाल के हैं जब हम यहां आने के लिए निकल रहे थे तो दिव्या जी जब तैयार होकर आई तो वर्मा सर कह रहे हैं "क्या जलवा है "!
सौंदर्य प्रेमी तो और भी होंगे , पर उसको इस तरह स्पष्ट स्वीकार करने वाला वर्मा सर के सिवाय मैंने दूसरा किसी को नहीं पाया। किताबों में कुछ लोगों के बारे में पढ़ा था ।जैसे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी हसरत मोहानी के बारे में पढ़ा है कि एक बार वह ट्रेन से कहीं जा रहे थे । उनके सामने दो रुसी महिलाएं बैठी थीं । हवा के साथ लहराते उसकी जुल्फों को देख कर मोहानी जी ने उसका माथा चूम लिया । इसपर वह महिला भी नाराज नहीं हुई । बल्कि उनकी सौन्दर्यप्रेमी दृष्टि की प्रसंशा ही की । कुछ ऐसे ही सौन्दर्यप्रेमी हैं अपने वर्मा सर ।
यहां बैजनाथ में ही मैंने पहली बार साफ ढंग से हिमालय देखा और कहा , सर वह पहाड़ सफेद कैसे हो गया है ? उनका कहना था क्या तुम्हें नहीं पता । अरे भाई वह हिमालय है जो बर्फ से ढका हुआ है उसे ही देखने तो सब यहाँ आते हैं ।
यहाँ एक मजेदार घटना यह हुई कि यहाँ एक पत्थर है , जिसे नौ लोग अपनी उँगलियों से उठा सकते हैं। इस पत्थर को उठाने में एक उंगली मेरी भी लगी । और हमने यह पत्थर उठाया ।
इसके बाद हम बागेश्वर चले आये। बागेश्वर में रवींद्र जी को तहसील में कुछ काम था , तहसील में कुछ देर तक बोर होने के बाद मैं श्वेता और दिव्या के साथ पास की चाय की दुकान में आकर बातें करने लगा । इस बीच धीरे धीरे मैंने चंद्रशेखर, प्रशांत , शिवांगी , जे एन यू और भविष्य की योजनाएँ लगभग सभी बातें धीरे धीरे करके बता दी। यह भी कि आजकल मैं उन लोगों को फोन नहीं कर रहा हूँ, फोन करूँगा तो कह दूंगा कि जबलपुर की दो लड़कियां मिल गई थी उधर ही व्यस्त हो गया था इसलिए फोन नहीं कर पाया । यहाँ से बोर होने के बाद हम पास के बागेश्वर मंदिर चले गए । बहुत ही सुन्दर मंदिर था बैजनाथ से भी बड़ा और पास में ही बहती सरयू नदी का दृश्य बड़ा ही मनोरम था । पूरा उत्तराखंड नहीं तो कम से कम कुमाऊं तो मुझे पूरी तरह शिवमय मालूम पड़ता है ।
मंदिर में घंटा भर बिताने के बाद हमने जलेबी समोसा का नाश्ता किया और इसके बाद दिनभर इन लोगों के साथ बीता। इसी बीच मैंने एक कविता लिखी । इक्कीसवीं सदी की लड़कियों के नाम , कि किस तरह हर प्रकार की बाधा को पार करके लड़कियां आगे आ रही हैं और इक्कीसवीं सदी लड़कियों की सदी साबित होगी । मेरी गोल रोटियों पर इन्हें जितना आश्चर्य हुआ था उतना ही उन्हें मेरी इस कविता पर भी हुआ , अरे! तुमने किनारे जाकर कविता भी लिख डाली- दिव्या ने कहा। इन लोगों को फोटो खींचने खिंचाने का बड़ा शौक था। थोड़े समय के लिए हम भी फोटोग्राफर हो गए। कैमरा हाथ में हो तो कैमरे की नजर से देखना और विभिन्न पलों को एक कैद करना बड़ा मजेदार अनुभव होता है। वैसे भी आजकल स्मार्टफोन ने हर एक व्यक्ति को लेखक-पत्रकार और फोटोग्राफर तो बना ही दिया है।
तहसील में सर्वर डाउन हो जाने के कारण रवींद्र जी का काम पूरा नहीं हो पाया और हम शाम 6:00 बजे वापस आ गए । इधर अंकित जी ने भी प्रायश्चित स्वरुप या भेदभाव का आरोप मिटाने के लिए पूरा मन लगाकर पनीर की सब्जी और पुलाव बनाया था। देर से सो कर उठने के कारण अंकित जी सुबह हम लोग के साथ घूमने नहीं गए थे। उन्होंने ने ही आलोक श्रीवास्तव जी की आगवानी की थी। बेहद थके होने के कारण हमें भूख लगी थी, हमने तुरंत ही रोटियां बनाई, सब ने भोजन किया। फिर हमने एक फिल्म देखी "हिंदी मीडियम" और सो गए।
अगले दिन करीब दस बजे यूं ही कविता की महफिल सज गई। पहले वर्मा सर ने प्रज्ञा रावत की कविता सुनाई "बड़बड़ाता हुआ आदमी" और "रविवार का दिन" फिर रवींद्र जी ने बशीर बद्र की एक नज्म उन्हीं के अंदाज में सुनाई । रवींद्र जी के बौद्धिक व्यक्तित्व से तो हम परिचित ही थे पर वह इतने बेहतर ढंग से नज्म भी सुनाएंगे इस बात ने हमें चौंका दिया। उस महफिल पर बशीर बद्र छा गए । इसके बाद भारती मैंम ने एक कविता सुनाई,
"तुम्हारा होना पता नहीं क्यों है ?
बहुत अच्छा लगता है, रविवार के दिन की तरह" ।
वर्मा सर को यह कविता इतनी पसंद आई कि उन्होंने उठ कर उन्हें चूम लिया । अब आलोक जी से कविता सुनाने का  आग्रह होने लगा , उनकी कविता के बाद बातें इस विषय पर होने लगी कि बशीर बद्र ने भाजपा ज्वाइन कर ली। वर्मा सर कह रहे थे भय, असुरक्षा या कमजोरी का वह कौन सा क्षण रहा होगा, जिसमें वह ऐसा करने को मजबूर हुए। हम उनको सहारा नहीं दे पाए । वर्मा सर की संवेदना का विस्तार बहुत दूर तक है, पर पहुंच उसकी उपेक्षा बहुत सीमित पर , यह बात कभी उनके सपनों और इरादों को नहीं सिकोड़ पाती।
आज शाम को ही भगवान सिंह जी, राकेश गुप्त जी ,और उनके मित्र मुनेश कुमार जी, बिंदा मैम, गोपी मोहन जी, और स्नेहाशीष आ गए थे । औपचारिक समागम की शुरुआत तो कल से थी। पर अनौपचारिक रूप से यह आज शाम से ही शुरु हो गया। अगले दिन प्रातः 9:00 बजे से सांस्कृतिक समागम की शुरुआत हुई । इसमें वर्मा सर, भगवान सिंह जी ,राकेश गुप्तजी, मुनेश कुमार, वृंदा जी, गोपी मोहन मोहंती, स्नेहाशीष ,अनिरुद्ध भाई, कपिलेश भोज जी , प्रवीण जी , अंकित जी, भारती मैंम, मैं, दिव्या जी श्वेता जी इतने लोग मौजूद थे । सबसे पहले परिचय सत्र चला। परिचय भी दो बार हुआ। सबसे पहले आप केवल अपना नाम बताइए । बाकी का परिचय वर्मा सर देने लगते थे । जो परिचय ज्यादातर प्रशंसात्मक होता है । निसंदेह यह परिचय कितना रोचक था कि प्रत्येक व्यक्ति की विशिष्टता को रेखांकित करता था । अब यदि कोई भी अपना परिचय इस तरह देता कि मेरा नाम अमुक है, मैंने अमुक विश्वविद्यालय से अमुक डिग्री ली है ,और अमुक जगह काम कर रहा हूं तो यह परिचय उसकी विशिष्टता को नहीं बता पाता । इसके बाद परिचय का दूसरा सत्र चला। इसमें आपको अपना परिचय देना था। जिसमें आपको यह बताना था कि आप किस तरह से जाने जाना चाहेंगे , साथ ही अपने पसंद की कोई कविता या गीत या कोई अनुभव साझा करना था। इस सत्र में भी सबने बड़ी बढियां बातें कही ,जैसे भारती मैम ने अपने परिचय में प्यार को बहुत ज्यादा अहमियत दी और कविता भी सुनाई,
"तुम प्यार करना और ऐसे करना"
किसी ने जीवन से प्रेम करने की बात कही , मैंने तो अपने जीवन में कविता को सबसे ज्यादा अहमिहत दी और केदारनाथ जी की कविता सुनाई ।
"दुःख ने मुझको जब जब तोड़ा
मैंने अपने टूटेपन को कविता की ममता से जोड़ा"
इसी तरह अनिरुद्ध भाई ने अपने जीवन पर बचपन से ही  गांधी, विनोबा ,विमला ताई,अध्यात्म इन सब बातों का जिक्र किया । हर परिचय से ऐसा लगता था कि इसमें थोड़ा मैं भी हूं । यानी हर परिचय मैं अपने आप को थोड़ा बहुत जुड़ा हुआ जरूर पाता था । यह परिचय का सत्र बहुत लंबा खींच गया । बाद में वर्मा सर ने कहा ,आप अपनी आलोचनाएं और सुझाव प्रस्तुत करिए कि सांस्कृतिक समागम को कैसे बेहतर ढंग से चलाया जाए?कपिलेश भोज  को परिचय सत्र का इतना लंबा खींचना कतई पसंद नहीं आ रहा था। सबसे तीखी और आवेगात्मक प्रतिक्रिया उनकी ही थी। इस तरह कार्यक्रम का बिखरा-बिखरा सा होना उन्हें बिल्कुल भी पसंद नहीं आ रहा था । वर्मा सर बताने लगे कि हमने बहुत नियोजित किस्म के सेमिनार भी आयोजित कराए हैं पर उनका भी कोई खास मतलब नहीं निकलता और एक बात जो वह अक्सर ही कहते रहते हैं गोष्ठी शुरू ही तब होती है जब खत्म हो जाती है। इस तरह इस सांस्कृतिक समागम से बहुत सी मित्रताएं बनी, कुछ पहले से घनिष्ठ हुई ,मैंने भी अधिकांश लोगों से संवाद बनाए रखा है। कार्यक्रम के बिखरे हुए स्वरुप को दूर करने और उसमें कुछ सोद्देश्यता लाने के लिए विषय तय किया गया "मानवीय गरिमा" और इसके बाद "जीवन शिक्षण" इस बीच लोगों की भागीदारी में कमी आने लगी । समागम में हिस्सा लेने के लिए बीएचयू से आई थी , प्रो-बिंदा परांजपे । उनके साथ उनका परिवार भी था । उनके पति गोपू मोहन मोहंती जी । जो एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं । उन्होंने परिचय के सत्र में यह कमाल किया कि वह बोले , मैं बढ़ा ही नकारात्मक इंसान हूँ । हर जगह मेरी निगाह कमियों या बुराइयों पर ही जाती है । उनकी यह बात सुनकर आलोक श्रीवास्तव जी भी उत्साह में आ गए। वह बताने लगे कि मेरे लिए अपने बारे में कुछ भी कहना बहुत कठिन होता है । आपने देखा ही होगा कि मेरी किताबों में परिचय के स्थान पर नाम , शिक्षा , प्रकाशित किताबों के सिवा और कुछ नहीं लिखा होता है । गोपी जी की बातों ने मुझे एक रास्ता पकड़ाया है । जिसके माध्यम से मैं अपने बारे में कुछ कह सकूं । मैं भी बड़ा नकारात्मक किस्म का इंसान हूं । फिर वह अपने बचपन से उदाहरण लेकर यह दिखाने की कोशिश करने लगे कि वह किस तरह से नकारात्मक इंसान हैं । और यहां से बातचीत का विषय हो गया , परिवार के भीतर की राजनीति । यह बात सभी को रोचक लग रही थी , और परिवार के भीतर की राजनीति पर सभी लोग आलोक जी को और सुनना चाहते थे । पर वर्मा सर ने बीच में हस्तक्षेप करते हुए कहा, देखिए इनकी भाषा की जादूगरी , आप दोनों यहां पर बैठे लोगों में सबसे ज्यादा सकारात्मक लोगों में से हैं । आलोक की कविताएं देखिए आप , उनमें इतनी सकारात्मकता और प्रेम भरा हुआ है और यह कह रहे हैं कि मैं बड़ा ही नकारात्मक किस्म का इंसान हूँ। इसी तरह गोपू जी, आपकी निगाह अगर बुराइयों पर या कमियों पर जाती है तो क्यों जाती है क्योंकि आप उन्हें दूर करना चाहते हैं। आपकी सकारात्मकता के दो उदाहरण तो यहीं बैठे हुए हैं बिंदा जी और आपका बेटा स्नेहाशीष। स्नेहाशीष बीएचयू से बीएससी की पढ़ाई कर रहा है। उसका सपना है वैज्ञानिक होनेे का । सत्रह साल की उम्र में ही वह जितना समझदारी भरी बातें कर रहा था, और समागम में बराबर की हिस्सेदारी कर रहा था। अपनी भाषा और अपनी जड़ों से भी जो उसका गहरा जुड़ाव था। यह सब बातें बहुत आश्वस्त कर रही थी , कि आने वाली पीढ़ी का भविष्य उज्ज्वल है और हमारे बड़े बुजुर्ग नई पीढ़ी पर भरोसा कर सकते हैं। वृंदा जी ने भी अपने परिचय में, भारती मैम की तरह प्रेम और जीवन के प्रति प्रेम को अहमियत दी। उन्होंने एक अनुभव सुनाया । लैटिन अमेरिका के किसी स्थान का जहां सर्वेक्षण के लिए वो लोग गए हुए थे । वह जगह एक नरसंहार का संग्रहालय (म्यूजियम) थी । उस स्थान के आदिवासी लोगों के ऊपर गोरे लोगों ने जो जुल्म ढाए थे । वह संग्रहालय आज भी उसकी कहानी बयान कर रहा था। वह बता रही थी कि वहां उन्होंने एक स्त्री का कंकाल देखा जो अपने कंधे पर अपने बच्चे को लिए हुई थी । और ऊपर से कुछ भारी बोझ गिर जाने के कारण दोनों की मृत्यु हो गई थी । बच्चा उसी स्थान पर दबा रह गया था । इस अवसर पर उन्होंने एक कविता लिखी थी ।  मैंने उनकी लिखी कोई किताब नहीं पड़ी है जो उस बारे में बात कर सकूं । पर उनकी यह कविता उनके संवेदनात्मक विस्तार को दर्शाती थी कि वह एक शुष्क एकेडमिक इंटेलेक्चुअल ही नहीं हैं ,बल्कि उनके भीतर एक नारी , एक मां का हृदय भी है ,जो औरों की तकलीफ भी समझता है । 
यहां पर राकेश गुप्त जी की वकालत का जादू चला हो या ना चला हो पर उनकी पाक कला की प्रतिभा को सब ने मान लिया । वह जितने भी दिन यहां रहे उनके पकाए खाने की वजह से हर एक दिन स्पेशल बनता रहा । बातचीत में भी बढ़ चढ़कर हिस्सा लेने वालों में उनका स्थान अव्वल रहा । मैंने जितना भी उनकी बातों को सुना वह न्याय , सामाजिक न्याय और संविधान इन अवधारणाओं के बीच आवाजाही करते रहे । इन्हें बेहतर ढंग से समझने समझाने की कोशिश करते रहे । सबसे कम दिनों तक रुकना हो सका मुनेश कुमार जी का वह कानपुर विश्वविद्यालय के शिक्षा विभाग से आए थे । वह बहुत ही प्रतिबद्ध शिक्षक मालूम पड़े । जो लोग मेरिट व प्रतिभा को बहाना बनाकर दलित बहुजन समाज के युवाओं को आगे आने से रोकते रहते हैं । वह अपने आप में उनका करारा जवाब थे । हर क्षेत्र में अव्वल रहते हुए अन्य पिछड़े हुए छात्रों की कैसे मदद की जाय ? इसके लिए निरंतर प्रयासरत रहने वाले । उन्हें एक ही दिन बाद जाना था । वह और रुकते तो समागम उनके अनुभवों से और लाभान्वित होता । दो दिन के लिए ही बनारस से वर्मा सर के मित्र और उत्तर प्रदेश सरकार की सेवा में लगे अभिषेक जी भी समागम में शामिल होने आये थे, लेकिन उनकी भागीदारी समागम में कम हो सकी, और मुझसे तो और भी कम।

कोई स्वास्थ्य कारणों से तो कोई निजी कारणों से हिस्सेदारी कर पाने में असमर्थ था। इस वजह से कार्यक्रम तय समय से पहले ही समाप्त हो गया। पर समापन से एक दिन पहले एक महत्वपूर्ण हिस्सेदारी हुई ,वाराणसी के कृष्णमूर्ति फाउंडेशन के अध्ययन केंद्र से आए विजय जी और हेमा जी की । इधर मैं चर्चा में ज्यादा हिस्सा नहीं ले रहा था। पर इन लोगों की उपस्थिति में जब चर्चा कृष्णमूर्ति और उनकी शिक्षाओं पर होने लगी। तो मैंने इस में पर्याप्त रूप से रुचि ली । इस बीच हमें अपने मेजबान रवींद्र शुक्ला जी का भी बेहतर परिचय प्राप्त हुआ। उन्होंने कृष्णमूर्ति फाउंडेशन की एक फेलोशिप पर दो साल काम किया था। सृजनशील प्रवृत्ति और अनुकरण ना करने की बुनियाद पर खड़े इस समुदाय में किस कदर अनुयायी बनने, बनाने की होड़ है। इसे देखकर इधर से उनका मोहभंग हो गया था।
वह मुझे बता रहे थे कि हमारे पास दो तरह के ज्ञान हैं ।एक तो आधुनिकता से उपजा ज्ञान-विज्ञान है, वामपंथी या आधुनिकतावादियों की कट्टरता है ,वहीँ दूसरी ओर जो इस कट्टरता से ऊपर उठते हैं, वह अध्यात्म में फंस जा रहे हैं ।वह अगर कुआं है तो यह खाई है।
वह कह रहे थे कि आधुनिकता और उसका प्रतिपक्ष दोनों एक ही ज्ञान से कैसे उपज सकते हैं? इसका एक निहितार्थ तो यह है कि साम्यवाद, पूंजीवाद का प्रतिपक्ष रच सकने में समर्थ नहीं है । पूंजीवाद या आधुनिकता तर्क और ज्ञान की बुनियाद ओर खड़ी हुई है। यह खड़ी ही हुई है तर्क और भावना को अलगाकर। अंतर्जगत और बाह्यजगत के बीच विभेद करके। ऐसे में उसका जो प्रतिपक्ष होगा, वह भावना, संवेदना, अंतरजगत इन सब को नकार कर नहीं चलेगा । इसी तरह भाषा का छल इसमें किस तरह काम करता है! क्योंकि सत्ता अपने आप को भाषा में ही अभिव्यक्त करती है । जिस बात को हम शब्दों में व्यक्त कर सकते हैं । उन शब्दों की एक सत्ता होती है । किस तरह दुनिया भर में समता स्वतंत्रता और बंधुत्व स्थापित करने के नाम पर लोगों का कत्लेआम किया गया। ये बातें उन्होंने कही। इसके अलावा उन्होंने परायेपन की अवधारणा पर भी अध्ययन किया है पर मैं इस बारे में ज्यादा कुछ नहीं पाया। वह कह रहे थे अध्यात्म परम अहमन्यता है । धीरे-धीरे हम अपने आप को सभी तरह के सामाजिक संदर्भों से काट लेते हैं और हमें इसी तरह जीना पसंद आने लगता है । उनके विचार मुझे इतने दिलचस्प लगे कि मैं उनसे घंटो बातें करता रह सकता था। पर अफसोस कि हमारी बातचीत विदा लेने के एक दिन पहले ही शुरू हुई। वह भी मुझसे बहुत उत्साह से बातचीत कर रहे थे । उन्होंने कहा युवा लोग मेरी बात बेहतर ढंग से समझ जाते हैं । वही पुराने लोगों को कुछ भी समझा पाना या कन्विंस कर पाना बड़ा मुश्किल होता है । पुराने लोगों के साथ मुश्किल यह है कि वह अपने ज्ञात को छोड़ नहीं सकते और जो अब तक हमारे लिए अज्ञात है उसको जानने के लिए हमें अपने ज्ञात को छोड़ना होगा। यदि हम ऐसा नहीं करते हैं तो अपने पिछले ज्ञान के आधार पर उसे नकार देंगे या पिछले ज्ञान के साथ उसका समन्वय करने लगेंगे। मैंने इस विषय पर एक कविता भी लिखी।
उन्होंने मुझे कुछ किताबें भी सुझाई हैं, उन्हें पढ़ लूं तब उनसे और बातचीत करता हूँ। रवींद्र जी ने हमें थोड़ा ट्रेकिंग करने का भी अनुभव कराया। इससे पहले मैं सोचता था , लोगों को क्या मजा आता होगा ? पहाड़ पर चढ़ने में! पर इस थोड़ी सी ट्रेकिंग में ही मैं समझ गया कि क्या मजा आता होगा! इसके बाद अब मुझे जब भी अवसर या संसाधन उपलब्ध होंगे, मैं ट्रेकिंग के लिए जरुर जाऊंगा । यह मुझे बहुत पसंद आया।
एक आखरी बात इस कौसानी यात्रा की, जब भी मैं सुबह उठता, उठकर बैठा ही होता कि रवींद्र जी दिख जाते , अरे उठ गए हो तो बैठे क्यों हो? बाहर आओ हिमालय को देखो । यहां सुबह सुबह हिमालय इतना सुंदर दिखता और थोड़े थोड़े समय पर अपना रूप बदलता रहता है । कोई कितनी देर तक निहारे, कितनी फोटो खींचे । कई लोग तो सुबह उठकर हिमालय के दर्शन करते हैं और फिर से सो जाते । मुझे श्रीधर पाठक की एक कविता की पंक्ति याद आती है ।
"प्रकृति यहां एकांत बैठी, निज रूप संवारती"
उन्होंने यह पंक्ति कश्मीर के लिए लिखी है पर मैं यही बात यदि कुमाऊं के लिए कहूं तो गलत न होगा । घुघूती का जिक्र किए बगैर यह प्रसंग पूरा नहीं हो सकता है। घुघूती यहां का एक राजकीय पक्षी है और राजकीय होने से ज्यादा उसका महत्व इस बात के लिए है कि वह यहां के बहुत से लोकगीतों का एक पात्र है । इस तरह वहां के निवासियों के जीवन का अंग है । मुझे भी एक लोकगीत याद है जिस के बोल हैं ,
"घुघूती ना बासा ,आमा की डाई मा
घुघूती ना बासा 
तेरी घुरु घुरु सुनी मैं लागू उदासा"।
इसमें एक स्त्री कहती है घुघूती तुम आम की डाल पर बैठकर घुरु घुरु ना करो । तुम्हारी यह घुरु घुरु सुनकर मैं उदास हो जाती हूं क्योंकि मेरे स्वामी परदेश में हैं । यह पंछी हर रोज सुबह सुबह दिख जाता था। यहाँ हमें गौरैया नहीं दिखी पर हर रोज घुघूती दिखता था । आजकल तो मेरी फेसबुक प्रोफाइल पिक्चर पर भी घुघूती की ही तस्वीर लगी है ।
आखिरी दिन रात में कॉकटेल पार्टी हुई । जिसमे मैंने खुद को भी यह इजाजत दे दी कि अरे सर के साथ तो पी ही सकते हो। कौन सा रोज रोज पीना है। मदिरापान के बाद हमने भजन सुना और भजन में जितना मन लग रहा था । उतना पहले कभी नहीं लगा। अंकित जी ने इस अवसर पर "छाप तिलक" और "रक्श ए क़मर" गाने पर जमकर नाचा । उनका नाचना मुझे भी उकसा रहा था, पर मैंने एक गाना गाकर ही संतोष कर लिया , पर आशा है कि अगली बार ऐसा नहीं होगा ।
समापन सत्र भी बहुत अच्छा रहा । सब ने बहुत महत्वपूर्ण टिप्पणियां की। मैं इतने दिन से बोलने से बच रहा था पर रवींद्र जी ने घसीट ही लिया । इस पर हमने अपनी बात कहने के बाद दो तीन कविताएं भी सुना दी।जो इस मनास्थित में लिखी गई थी। इस पर भगवान सिंह जी की महत्वपूर्ण टिपण्णी यह आई कि अच्छा तो तुम इसलिए इतना मन लगाकर काम कर रहे थे । यह तुम्हारी साधना का ही अंग था । यहीं पर हमें कवि अंकित पाठक से भी परिचय हुआ । हमने उनकी कविता सुनी "तुम्हारा रविवार", जिस पर भगवान सिंह जी कहना था.. किसकी है ये कविता..! अरे तुम कविता भी लिखते हो..! इतना शरारती आदमी कविता कैसे लिख सकता है..! असल में भगवान सिंह जी जब भी बोलना शुरू करते थे तो कभी भी कोई वाक्य पूरा नहीं होता था, एक वाक्य अगले वाक्य को तुरंत जन्म दे देता था, प्रायः उनकी बातचीत इतिहास के हवाले से होती थी.. जो बहुत से लोगों के लिए रूचि का विषय नहीं थी, वर्मा सर को छोड़कर.., वर्मा सर पूरी गंभीरता के साथ उनकी बात सुनते थे, शायद उनके छियासी वर्ष के शरीर छिपे हजारों वर्षों का इतिहास तलाशते थे। भगवान् सिंह जी की धारा प्रवाह बातचीत में किसी और को बोलने का मौका कम मिलता था, यहाँ अंकित जी ही गुस्ताख़ी करते थे और बातचीत का रुख किसी और तरफ मोड़ते थे। दोपहर में भगवान सिंह जी को निकलना था । भगवान सिंह जी दोपहर में ही अपने शाम की व्यवस्था बना कर चल पड़े । उन्हें हर शाम तीन पैग पीने की आदत है वह भी अपना पैग खुद बनाकर। उसे बोतल में भरकर रख लिए ताकि रास्ते में पी सकें । छियासी साल की उम्र में भी वह अकेले ही इतना लंबा सफर तय करके आ गए थे और जाना भी अकेले ही हुआ । वह हर एक बात इतने विस्तार से बताने लगते थे की सुनने वाला ऊब जाय पर समापन सत्र में उन्होंने हमारे काम और इंतजाम की सराहना की । क्योंकि वह बड़े ही ईमानदार आदमी हैं । बड़ी साफ-साफ बातें कहने वाले ।इन सारी बातों में अनिरुद्ध भाई के बारे में तो बातें कहना रह ही गया । पर हम इसे रहने ही देते हैं । क्योंकि अनिरुद्ध भाई चुप रहकर काम करने वाले लोगों में से हैं । नाम और प्रसिद्धि के पीछे भागने वाले लोगों में नहीं । "जीवन शिक्षण" वाले सत्र में जब वह अपने अनुभव के बारे में बता रहे थे तब विश्वास नहीं हो रहा था कि इस प्रसन्नचित्त रहने वाले भलेमानस ने इतनी लडाइयां लड़ी होंगी । पर जिस तरह बापू को (महात्मा गांधी)कौन योद्धा मानेगा पर बापू ने ब्रिटिश राज की जड़े हिलाकर रख दी । विनोबा लिखते हैं कि जब हनुमान जी लंका पार कर आए तो उनसे पूछा गया कि आप किस बल से यह काम संभव कर सके । विनोबा जी लिखते हैं अकेला वानर किस बल से इतना बड़ा समुद्र लाँघ सका होगा, हनुमान का जवाब था राम नाम के बल से । तो हम किसी का बाहुबल ना देखे बल्कि उसकी निष्ठा देखें । गांधीवादियों के सिद्धांत कि मैं कितनी भी कमियां गिना लूँ । पर अपनी निष्ठा में वह बेजोड़ होते हैं । ऐसे ही हैं अपने अनिरुद्ध भाई । मैं उनको प्रणाम करता हूं । 
हम लोगों की ट्रेन रात के आठ बजे काठगोदाम रेलवे स्टेशन से थी । हम हम दोपहर दो बजे ही घर से निकल गए। अब की बार रानीखेत हाईवे से होकर जा रहे थे। इतना सुन्दर था ये रास्ता की क्या कहें ? और मन में यह अफ़सोस हो रहा था कि हम इतनी सुंदर जगह को छोड़कर जा रहे थे । पर मोह में क्या पड़ना ? यह आदमी के मोह और लालच का ही परिणाम है कि वह हर एक सुख को स्थाई बना देना चाहता है । इसी चक्कर में लोगों ने पहाड़ों की जो दुर्दशा कर रखी है वह भी हमने देखा । बड़ा दुख भी हुआ यह सब देख कर । जब हम नैनीताल की ओर से आ रहे थे तो रास्ते में भीमताल पड़ा । भीमताल बहुत ही सुंदर था । वर्मा सर ने यहाँ की पहली यात्रा पचास के दशक में की थी, जब वे सत्रह साल की उम्र में पहली बार किसी कार्यशाला में भाग लेने के लिए पहली बार भीमताल आये थे। उसके बाद से ही पहाड़ उनके जीवन का हिस्सा बन गया। वो अक्सर गर्मियों में यहाँ साहित्य रचने और सौंदर्य अनुभूति के लिए आते रहते थे, कौसानी उनकी पसंदीदा जगहों में से एक है, और इत्तेफ़ाक देखिये, उन्हें ज़िंदगी के इस पड़ाव पर देहरादून में एक नया पता मिला, मन प्रकृति के सबसे करीब रहने वाले वर्मा सर अब शरीर से भी प्रकृति के करीब रहने लगे हैं। वे रास्ते में हमें बताने लगे कि पहले जब हम यहां आते थे तो यहां दूर-दूर तक कोई मकान नहीं होता था । एकाध होटल होते थे । अब तो स्थिति यह है कि ताल में एक छोटा सा टापू है तो वहां भी इमारत खड़ी कर ली गई है । वर्मा सर बता रहे थे कि पिछले साठ सालों में उत्तराखंड में जितना सीमेंट आया है । उसने उत्तराखंड को बर्बाद करके रख दिया है । 
इसी क्रम में वह यह भी बताने लगे कि कहा जाता है कि पूंजीवाद में उपभोक्ता या ग्राहक सर्वोपरि होता है । पर यह बात कितनी गलत है । इसका उदाहरण हमने स्विट्जरलैंड में देखा , वही व्यक्ति जब हम आए तो उसका व्यवहार ऐसा था की क्या कहें ? वहीं जब हम जाने लगे तो उसका व्यवहार ऐसा बदल गया की क्या कहा जाए?  भीमताल से आगे बढ़ने पर सघन बसावट का क्षेत्र शुरू हो गया है । यह बसावट इतनी सघन हो गई है कि भीमताल और नैनीताल लगभग एक हो गए हैं । अब हम काठगोदाम रेलवे स्टेशन पर आ गए। यह काठगोदाम रेलवे स्टेशन भी बहुत सुंदर है । कम से कम मैंने तो इतना सुंदर रेलवे स्टेशन कहीं और नहीं देखा । खाना खाकर आने के बाद हम अपनी जगह पर आकर बैठ गये । बातें होने लगी । वर्मा सर ने कहा हल्द्वानी और देहरादून यह दो द्वार हैं । उत्तराखंड के । पर इन दोनों के बीच आपस में संपर्क ही इतना कमजोर है कि ट्रेन को पहले यूपी में जाना पड़ता है , फिर वहां से देहरादून के लिए चलती है । फिर बातें पुराने समय के कठिन जीवन और आज की प्रगति पर होने लगी । इसके बाद वर्मा सर बताने लगे कि किस तरह वह इंटरमीडियट में नैनीताल घूमने आए थे। उनके एक पड़ोसी ने यूं ही मजाक में कहा , नैनीताल घूमने चलोगे । उन्होंने कहा हां , जरुर चलूंगा । घूमने का इतना मन था पर पैसे नहीं थे । जैसे-तैसे 10 रुपए की व्यवस्था की और चल पड़े उनके साथ । 
मुझे इसके बाद नींद आने लगी । मैं सोने चला गया । उन लोगों की बातें चलती रही । 
हम सुबह चार बजे देहरादून स्टेशन पर उतरे, बारिश ने हमारा स्वागत किया और पांच बजे हम वर्मा सर के घर पर थे । वर्मा सर बड़े उत्साह से बता रहे थे अपने सज्जन पड़ोसियों के बारे में , इसके अलावा उनका बहुत समय से सपना है कि एक आश्रम बने , तो वह इस बारे में भी बड़े उत्साह से बता रहे थे । कौसानी में आलोक श्रीवास्तव जी से बातचीत करने का अवसर बहुत कम मिल पाया था । पर वह कमी यहां आकर दूर हो गई । वह मेरी कॉपी उठाकर पढ़ने लगे । और इत्तेफाक से वर्मा सर को लिखी वह चिट्ठी उनके सामने खुली जो एक आश्रम बनाने को लेकर ही थी । उन्होंने मेरी पूरी चिट्ठी पढ़ी और कहा , आप भी इसमें आश्रम बनाने को लेकर जो बुनियादी प्रश्न है , बुनियादी कठिनाइयां हैं , उन पर बात नहीं कर रहे हैं । आप कुछ कम जरूरी बातों को ज्यादा महत्व दे रहे हैं ।इसके बाद उन्होंने वर्मा सर का मूल्यांकन ही पेश कर दिया । वर्मा जी बुनियादी महत्त्व के सवालों को इतना महत्व नहीं देते रहे हैं । इसलिए ही उन की योजनाएं विफल होती रही हैं । इसके साथ ही वह बहुत स्वार्थी और महत्वाकांक्षी किस्म के लोगों से लंबे समय तक घिरे रहे हैं । और उन्होंने उनके प्रति खुद को रिजर्व नहीं रखा । इस चक्कर में उनकी बहुत सी उर्जा और समय खर्च होता रहा । अन्यथा उन्होंने और भी बहुत से काम किए होते । यहां पर आलोक जी और वर्मा सर के बीच अक्सर ही हिंदी में अच्छी किताबों की कमी या दुर्लभता ,अच्छी पत्रिका और अच्छी पत्रकारिता की कमी और प्रकाशन व्यवसाय इन सब पर प्रमुखता से बातें हो रही थी । मेरी भी इस मामले में बहुत रुचि है इसलिए मैं इस बातचीत को बराबर सुन रहा था । ऐसी बातचीत के बीच वर्मा सर अक्सर सांस्कृतिक आंदोलनों की आवश्यकता , लघु पत्रिका आंदोलन, इसकी बातें करने लगते हैं । पर मुझे ऐसा लगता है कि आने वाला समय इ- पत्रकारिता का होगा । इसलिए मैं ई पत्रिका के पक्ष में बोल रहा था । हमारे बीच यह प्रश्न अनिर्णीत ही बना रहा कि लोगों तक पहुंच को महत्व देते हुए पत्रिका का स्वरूप लोकप्रिय होना चाहिए या लोगों की रूचि से ज्यादा स्तरीयता को महत्त्व दिया जाना चाहिए । हिंदी में स्तरीय पत्रिकाओं का अभाव दूर करने के लिए ।
वर्मा सर की आश्रम की योजनाओं को सुनने और आलोक सर को वर्मा सर के बगल में घर लेने की सलाह देने के बाद हम नाश्ता करके सो गए । वर्मा सर का घर , देहरादून के मुख्य शहर से कुछ दूरी पर था । इसलिए आज कहीं दूर घूमने जाना संभव नहीं था हम पास के ही जंगल में घूमने चले गए । जंगल में एक सुखी सी नदी थी , जो पत्थरों से भरी थी । ये पत्थरों वाली नदी और इसके पत्थरों को देखकर अंकित जी का उत्साह देखने लायक था । एक के बाद एक ढेर सारे पत्थरों और पत्थरों के बीच हरियाली की फोटो खींचने के बाद अंकित जी ने कहा कैसे कोई किसी को पत्थर दिल कह देता है । यह पत्थर तो इतने प्यारे हैं , लगता है अभी बोल पड़ेंगे । आज से मैं अपने नाम से अमलतास शब्द हटाकर वहां पत्थर दिल जोड़ लेता हूं । अंकित पत्थर दिल । एक फोटो तो उन्होंने ऐसी खींची , पत्थरों के बीच एक छोटे से पौधे की । जो "अहा जिंदगी" के चित्र के ऊपर कविता लिखिए । उस कॉलम के लिए बिल्कुल उपयुक्त थी।  हो सकता है आने वाले अंको में आप इसे देखें । पत्थरों से बातें जाने कैसे सिनेमा पर आ गई। खैर ये तो होना ही था , अंकित जी जहां भी रहते हैं वहां उस बातचीत से जुड़ा सिनेमा का कोई पक्ष है या उस पर बनी कोई फिल्म है तो उसका ज़िक्र जरुर आ जाता है । यह सिनेमा का रोग उन्होंने इलाहाबाद में भी बहुतों को लगाया । उनकी वजह से बहुत से लड़के मनोरंजक फिल्मों के साथ यथार्थवादी और कला फ़िल्में भी देखने लगे । मैं भी इनमें से एक हूँ ।
अंकित जी एफटीआईआई के सिनेमा पर कराए जाने वाले एक महीने के कोर्स के बारे में बता रहे थे।  आलोक जी ने भी इसे करने की इच्छा जाहिर की । अगले दिन हम दोपहर में मसूरी देखने के लिए निकल पड़े । मसूरी की बस के लिए इतनी लंबी लाइन लगी थी कि यदि हम घंटे भर के बाद भी टिकट पा जाते तो गनीमत थी और बस का मिलना तो और भी बाद में होता क्योंकि हम से पहले जिन लोगों ने टिकट ले रखा था  पहले उन्हें जाने का मौका मिलता । फिर हमारा नंबर आता । लाइन में थोड़ा समय बेकार करने के बाद हम सामने प्राइवेट टैक्सी बुकिंग के स्थान पर आ गए । इसका किराया आने और जाने का 2810 रुपए था । वही बस का किराया था इसी 35 किलोमीटर की दूरी के लिए महज 40 रूपए । किराए की इस राशि को सुनने के बाद हम थोड़ी देर यूं ही इधर उधर टहलते रहे । अब हमारे पास दो ही रास्ते थे या तो हम वापस चले जाएं या फिर इस कीमत का भुगतान करें । इस बीच हमने इस विषय पर भी बातें कर ली की सरकार तो पैसा कमाना ही नहीं चाहती । सरकर को बसों की संख्या बढ़ा देनी चाहिए और किराया भी बढ़ा लेना चाहिए । पर सरकारी तंत्र की यह हीलाहवाली ही निजीकरण के लिए जिम्मेदार है । सरकारी अफसर जानबूझकर सरकारी तंत्र को चूना लगाते रहते हैं और निजी उद्यमियों को इसी तरह फायदा पहुंचाते रहते हैं । 
हमने मसूरी चलने का निर्णय ले लिया पर इसके लिये पांच लोगों की आवश्यकता थी ।  हम तीन ही थे । इत्तेफाक से वहां मौजूद दो लड़कियां जो नोयडा से देहरादून मुख्यतः केम्पटी फॉल देखने आई थी । वह भी हम लोगों के साथ हो गयी । हम किसी से बात किए बगैर उसे किसी खांचे में रख देते हैं या उसके हाव-भाव कपड़े-लत्ते और बॉडी लैंग्वेज के आधार पर किसी एक तरह का टाइप मान लेते हैं । पर जब हम उससे बात करना शुरु करते हैं तो व्यक्ति की विशिष्टताएं नजर आना शुरु हो जाती हैं । सफर की शुरुआत में मैंने इन दोनों आधुनिकाओं को एक टाइप ही मान रखा था । हम तीनों भी आपस में ही बातें कर रहे थे और वह दोनों भी आपस में या फिर भानु जी टैक्सी वाले से । पर थोड़े समय बाद इधर से अंकित जी ने औपचारिक बातचीत की पहल कर दी और उधर से साक्षी ने । साक्षी का इलाहाबाद कनेक्शन भी था । उसकी नानी का घर इलाहाबाद में था । सबसे पहले हम मसूरी के रास्ते में पड़ी एक झील में गए।
वहां पर एक झरने का पानी गिर रहा था । जिसे देखने आने वालों के लिए एक मेला सजाया गया था । यह मेला मुख्यता परिवार के साथ घूमने आने वालों को ध्यान रखकर बनाया गया था । बच्चों के मनोरंजन की चीजें प्रमुखता से थी । यहां एक फोटो पार्क भी था जिसमे निंजा हथौड़ी ,डोरेमोन और मोटू पतलू, छोटा भीम के साथ आप फोटो खींचा सकते थे। यहां एक घोस्ट हाउस भी था और कुछ दुकानें उत्तराखंड और पहाड़ी क्षेत्रों की परंपरागत पोशाक किराए पर दे रही थी फोटो खिंचाने के लिए । फोटो खींचने खिंचाने या खाने पीने में ही ज्यादातर लोग व्यस्त थे । यहां हमारी रूचि का कुछ भी नहीं था । भानू भाई ने हमें आधा घंटे का वक्त दिया था । और हम 20 मिनट में ही वापस आ गए ।
इसके बाद हम मॉल रोड के लिए चल पड़े । मॉल रोड का नाम सुनकर अंकित जी याद करने लगे कि उन्होंने मॉल रोड का जिक्र किन किन फिल्मों में सुना है । वही मैं लक्ष्मी बर्थवाल और उन सभी पहाड़ के लेखकों को याद करने लगा । जिन की कहानियों में मैंने मॉल रोड या तल्लीताल मल्लीताल इन सब का जिक्र सुना पढ़़ा है । माल रोड पहुंचने से पहले इतनी ऊंचाई पर आकर जो धुंध और कोहरे का माहौल था । ठंडी -ठंडी हवाएं चल रही थी और इस बीच भानु भाई के रेडियो पर किशोर कुमार के गाने । माहौल को बहुत रुमानीपन से भर रहे थे । हम सभी अपने अपने चाहने वालों को याद कर रहे थे। अंकित जी का मन नहीं लग रहा था , वे सबसे ज्यादा किसी को याद करते खोये हुए थे।
इस बीच सबसे ज्यादा खटकने वाली बात थी सड़कों पर पसरा लंबा जाम । बार-बार गाड़ी रोकनी पड़ रही थी । और इस दौरान कुछ लड़के एक डोलची खाँची में पहाड़ी फल लिए सामने से गुजरते थे । फल ले लो , खुबानी , आलूबुखारा , पहाड़ के फल ले लो । मॉल रोड की सुंदरता में कोई कमी नहीं थी, छह हजार फीट से अधिक की ऊंचाई और गांधी की उपस्थिति हमें प्रेरणा तो दे ही रही थी साथ ही मौसम भी हमें गुदगुदा रहा था। यहां पर साइकिल रिक्शा के भी दर्शन हुए । धुंध में आते जाते लोग । सब कुछ बहुत अच्छा लग रहा था । पर निराशा हुई सबसे अधिक यहाँ की दुकानों से  । दुकानों के लिए नाम बड़े और दर्शन छोटे यही मुहावरा ठीक होगा । आजकल दुकानदारों का लक्ष्य ग्राहकों की सेवा या सहायता करना नहीं रह गया है । बल्कि ठगना ही हो गया है । यह ठगने की प्रवित्ति हमने यहां भी पाई । वस्तुओं के दाम बहुत ज्यादा थे । हमें कुंवारे लोगों को तो कुछ खरीदना भी नहीं था । हमें एक तो प्रो पीपल दुकान मिल गई । जहां हमने चाय और समोसा खाया । वहीं साक्षी और मेघा को भूख लगी थी तो वो लोग अलग निकल पड़ी खाने पीने, उन्होंने छोले भटूरे खाएं और बाद में हमसे मिलने पर कहा, कब हम नोयडा पहुंचेंगे! कब अच्छा खाना खाएंगे! उसको अच्छा खाना बनाने का बहुत शौक था । और खाने की बहुत अच्छी समझ थी । इसलिए उसे यहां या कहीं का भी काम चलाऊ भोजन रास नहीं आ रहा था । इसलिए ही उसे अपने घर की याद सता रही थी। खाने के बारे में अपने इस अनुराग की बात उसने केम्पटी फॉल से लौटते हुए बताई । जब उसे वहां भी कुछ खाने के लिए पसंद नहीं आया । फिर वह बताने लगी कि हम दोनों मिलकर एक रेस्टोरेंट खोलना चाहती हैं । पर घर वाले क्या कहेंगे बेटा लाखों रुपए खर्च करके हमने क्या तुम्हें मास कम्युनिकेशन की पढ़ाई इसलिए ही कराई ताकि तुम आगे चलकर ढाबा खोलो ।? यह एक बहुत बड़ी समस्या है अपने देश में, पहले तो आदमी को पता ही नहीं होता की वह करना क्या चाहता है? और यदि किसी को पता भी हो तो वह व्यक्ति अगर गरीब है तो वह बहुत खर्चीली पढ़ाई लिखाई नहीं कर सकता और यदि व्यक्ति की हैसियत यदि ठीक-ठाक है तो उसके लिए खाना बनाना या इस तरह के बहुत से काम प्रतिबंधित मान लिए जाते हैं । छोटे मान लिए जाते हैं । अपने देश में श्रम की भी कोई गरिमा नहीं है । नहीं तो लोगों की हैसियत में इतना बड़ा फासला ना होता।
खैर मॉल रोड पर स्थित लगभग डेढ़ सौ साल साल पुरानी पब्लिक लाइब्रेरी का जिक्र किए बगैर यह प्रसंग पूरा नहीं हो सकता है । यहां पर एक लाइब्रेरी है। हमने स्थापना की तारिख और महीना जानने के लिए थोड़ी पूछताछ करनी चाही। वहां के कर्मचारियों को इसकी जानकारी तो थी नहीं । उन्होंने हमें फोटो खींचने से भी मना कर दिया । हम बाहर निकल आए । वहां दो महिला कर्मचारियों के अलावा कोई भी पढ़ने वाला नहीं था, चारों तरफ सन्नाटा था, हम लोग के अलावा एकाध पर्यटक यहां और आये होंगे। अंकित जी ने कहा हम यदि फोटो खींचते और इस बारे में कुछ लिखते तो और भी लोगों का ध्यान इस ओर जाता । यह लाइब्रेरी है कोई संग्रहालय तो नहीं कि यहाँ फोटो खींचना मना है, और किसी संस्था के कर्मचारियों को उस संस्था के इतिहास के बारे में जानकारी न होना उनकी सीमित रूचि को दर्शाता है और सरकारीकाम के प्रति कामचलाऊ प्रवृत्ति को भी। इस पर मैंने कहा , सरकारी कर्मचारी केवल बैठे रहने के लिए होते हैं और अनावश्यक रुप से टोका टाकी करते रहने के लिए । यहां चौराहे पर नाचते -गाते और तुरही जैसा कोई वाद्य यंत्र बजाते हुए स्त्री पुरुषों की छोटी-छोटी मूर्तियां थी । यह काफी आकर्षक थी, यहां अंग्रेजों के जमाने में रोज शाम को बैंड बजाया जाता था, इसलिए इस चौराहे का नाम 'बैंड स्क्वायर" था। यहां पर मैंने एक बोर्ड पढ़ा था , " पहाड़ों की रानी मसूरी में आपका स्वागत है " मुझे लगता है कि मसूरी में इतनी भीड़ -भाड़ और इतना प्रदूषण हो गया है कि पहाड़ों की रानी ने  किसी और पहाड़ पर शरण ले ली होगी । यहां पर एक स्थान पर जिसके नीचे पार्किंग की जगह थी । वहां से डीजल-पेट्रोल के जलने की इतनी तीखी गंध आ रही थी कि वहां पर खड़ा होना मुश्किल था । हमने भानु भाई से पूछा की यह गंध कैसी है ? उन्होंने बताया कि यह गंध गाड़ियों के क्लच आयल की वजह से है । लोगों को पहाड़ों पर गाड़ी चलाना आता नहीं है , और इस वजह से गाड़ियों की भी हालात एकदम ख़राब हो जाती है ।
साक्षी और मेघा को आज रात को ही दिल्ली की बस भी पकड़नी थी । जिसका समय रात देहरादून से रात नौ बजे था । इसलिए अब हम सीधे केंपटी फॉल के लिए चल पड़े । केम्पटी फाल में सबसे अनोखी बात यह नजर आई की यहां नहाने के लिए आप हाफ पेंट और टीशर्ट किराए पर ले सकते हैं । यहां पर सबसे ज्यादा दुकानें इसी की थी । पहाड़ों से गिरने वाले ठंडे पानी से नहा कर लोग खुद को तरोताजा कर रहे थे । यहां पर भी फोटो खींचने और खिंचाने का बाजार गर्म था । बहुत से लोग सेल्फी लेने के लिए हाथ में सेल्फी खींचने वाली छड़ी पकड़े घूम रहे थे । हम तीनों लोग नहीं नहाए । अंकित जी के हाथ में कैमरा था । वह फोटो खींचने में लगे रहे । मैं नहाने वाले लोगों के उत्साह को देख रहा था । मैं जहां खड़ा था । वहां एक छोटा बच्चा खड़ा था । वह उतना छोटा था कि पानी में नहीं जा सकता था । और वह इतने उत्साह से मम्मी मम्मी चिल्लाये जा रहा था कि कोई भी मम्मी शर्मा जाए । उसकी मम्मी भी बार बार इधर उधर ओझल हो जा रही थी । और वह उनको ढूंढ कर फिर से दोगुने जोर से चिल्लाने लगता था । वह बच्चा मेरा अच्छा मनोरंजन कर रहा था । बूढ़े लोगों का उत्साह और नौजवान लोगों का एटीट्यूड सब कुछ देखने लायक था । यहां से वापस आने के बाद हमने भुट्टा खाया । रास्ते में भुट्टे की दुकानें हमारा ध्यान खींच रही थी । पर देर ना हो जाए इसलिए हम कहीं रुके नहीं । हम सब ने कॉफी पी । साक्षी ने कुरकुरे का एक पैकेट खरीदा । जिसकी कीमत 20 रुपए थी पर दुकानदार 25 रुपए मांग रहा था । इस पर वह झगड़ पड़ी । दुकानदार का तर्क यह था की पहाड़ों पर ट्रांसपोटेशन महंगा पड़ता है । इसलिए कीमत ज्यादा है । उसका कहना था यह मनमानी नहीं चलेगी । 25 रूपऐ हम दे देंगे पर 25 रूपए लिखा भी होना चाहिए । बाद में आलोक जी ने इसे लेकर उसको दिया । पर यहां से जो उसने बोलना शुरु किया वह नॉन स्टॉप पूरे रास्ते जारी रहा है । इस बीच उसने अपने मम्मी पापा , अपने भाई रामदेव और अपने फोटोग्राफी और खाना बनाने के शौक, सब कुछ की कहानी कह दी । उसकी सहेली मेघा का बोलना उसके पूरक के तौर पर ही हो रहा था । वह दोनों पहली बार साथ-साथ यूं घूमने चली आई थी । साक्षी को हॉन्टेड प्लेस पर जाने का शौक था । और उसने अपनी अगली योजना राजस्थान के उदयपुर के लिए बना रखी थी । हम भी रात दस बजे तक अपने आशियाने पर पहुंचे । और थके होने के कारण जल्दी से सो गए । आज हम लोगों को इलाहाबाद के लिए निकलना था इसलिए मैंने अपना लिखा सब कुछ , वर्मा सर को सुना लेना जरूरी समझा । मैंने सुनाना शुरू ही किया था कि आलोक जी और अंकित जी भी वहां आ गए । जितना लिखा था वह सब कुछ मैं सुना भी नहीं पाया और अंकित जी और आलोक जी की ओर से प्रतिक्रियाएं मिलने लगी।  इस बीच आलोक जी की ओर से यह महत्वपूर्ण सुझाव आया कि मैं ,गौरव , किशन , अंकित जी और भी इस तरह के बाकी सभी छात्र सर के घर पर आ जाएं । और एक सप्ताह तक प्रेम पर सवाल जवाब करें । और वर्मा सर इतिहास क्या क्यों कैसे ? की तरह ही प्रेम क्या क्यों कैसे?
एक किताब तैयार कर दें । बहुत ज्यादा बातें नहीं हो पाई क्योंकि आज वर्मा सर और आलोक जी से मिलने कवि लीलाधर जगूड़ी जी आने वाले थे । मैं और आलोक जी लीलाधर को लेने सड़क तक गए । क्योंकि वर्मा सर का घर मुख्य सड़क से थोड़ी दूरी पर था । लीलाधर जी को हमने बुरांश के फूलों का शरबत पिलाया । तो बातें बुरांश से होते हुए शैंपेन पर होने लगी । जगूड़ी जी शैंपेन बनाने के बारे में बताने लगे ।
इस बीच सर की पत्नी रजनी भी इस वार्ता में शामिल हो गई । आंटी इन सब बातचीत में कम ही शामिल होती हैं स्वास्थ्य कारणों से । पर जब भी शामिल होती हैं उनकी स्मृति और सुरुचि संपन्नता के कारण उनकी धाक जम जाती है । अब बातचीत का विषय हो गया था पुराने लोकप्रिय उपन्यास लेखक आंटी को ऐसे ऐसे पुराने लेखकों का नाम याद था की सबको आश्चर्य हो रहा था । इसके बाद बातचीत रस और छंद पर होने लगी । जगूड़ी जी बताने लगे की छंद तो प्रत्येक वाक्य में होता है । हम जो कुछ गद्द में बोल रहे हैं । उसमें अनुष्टुप छंद है । पर बहुत से कवियों के लिए तुक मिला लेना ही बड़ी उपलब्धि की बात होती है । जबकि तुक मिलाना कोई छंद नहीं है । छंद और रस की बात करने के बाद हमने उन्हें भोजन का रसास्वादन करने के लिए आमंत्रित किया । वर्मा सर आलोक जी और जगदीश जी ने साथ भोजन किया । आलोक जी को आज मेरठ निकलना था । वह जगूड़ी जी के साथ ही चले गए । हमने भी खाना खा खाकर आराम किया । बहुत सी अधूरी बातों के साथ हम भी चार बजे सर के घर से बाहर आ गए । हमारी ट्रेन छह बजे देहरादून रेलवे स्टेशन से लखनऊ के लिए थी । 
मैंने चलते-चलते सर से कहा सर आप अपने गुरु रेमो आरों की स्मृति में जो किताब लिखने वाले हैं , उसमें जुट जाइए ,और बातों से ध्यान हटाकर । इसकी योजना वर्मा सर और आलोक जी के ने मिलकर बनाई थी । हृदयाघात से ठीक होने के बाद सर के महत्वपूर्ण कार्यों में से है , अपनी आत्मकथा लिखना , प्रबोधन श्रंखला चलाना, इस तरह के सांस्कृतिक समागम का आयोजन करना , इसमें एक यह उपलब्धि भी जुड़ जाए । मैं ऐसा चाहता हूं, इसलिए आखिर में याद दिला रहा हूं । पता नहीं आपके बाद कोई  न लिखे या लिखे भी तो निष्पक्षता से लिखें , इसकी उम्मीद नहीं है । तो हम बहुत सी अधूरी बातों के साथ सर के घर से विदा हुए । पाठकों मुझे भी आप से अलविदा कहने का वक्त आ गया है मेरे मित्र चंद शेखर जी की कविता की पंक्तियां है ,
खत्म नहीं होती हमारी बातें ,
खत्म हो जाते हैं ,
साथ साथ साथ चलने के बहाने 
हमारी भी बातें खत्म नहीं होंगी । बस यह स्थगित रहेंगी । अगले सफर तक के लिए ।
  ____अंकेश मद्देशिया

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