यादों की नाव

बचपन में हम बर्षा के दिनों में
पानी में नाव चलाया करते थे
नाव पर एक चींटा बैठा दिया करता था
यह सोच कर की वह नाव चलाएगा
नाव पानी की धरा में बह निकलती थी
और हम खुश होते थे कि नाव
चींटा चला रहा है
खैर वह बचपन के दिन थे...
आज भी जब फुरसत के पलों में
मन की तरंगों पर
यादों की नाव चलता हूँ
उसपर तुम्हारे साथ गुजरे
कुछ पलों को बैठा  देता हूँ
धीरे धीरे नाव आगे बढती है
मैं मगन होता हूँ
कि नाव तुम्हारे यादों से पतवार से चल रही है ...

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

कौसानी की यादें

शेखर के गांव में

मन्दिर का प्रसाद