तुम्हारा ख़त

उषा की किरणों में लिपटा
तुम्हारा ख़त
जब खोलता हूँ तो
शब्द एसे अन्दर जातें है
जैसे केले के पत्तों से
चमकती हुयी ओस की बूंद
जमीन पर गिरकर ख़तम हो जाती है
महुए की सुगंध आती है ,
तुम्हारे शब्दों से
तुमारी चिट्ठी
जब सुबह मोबाइल को गनगना जाती है
तो एसा लगता है जैसे
आम की बगिया में सूखे पत्तों पर
अमिया के टिकोरे गिर गये हों
तुम्हारी चिट्ठी को जब मैं
खोलता हूँ तो जैसे चने और गेहूं
के पकाने की सुगंध आती है तुम्हारे शब्दों से ..

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