समय की रेत

जब भी लौटता हूँ
तुम्हारे पास से
समेट लेता हूँ कुछ पल
समेट लेता हूँ कुछ यादें
समेट लेता हूँ तुम्हारा प्रेम
और कुछ आंसूं की बूंदें
जब भी मैं लौटता हूँ समेट लेता हूँ
समय की रेत
और बिखरा देता हूँ
पन्नो पर
दीवारों पर
हर उस वास्तु पर
जहाँ तक जाती हैं मेरी नजरें
बिखरा देता हूँ तुम्हारी यादों रंग
जहाँ भी खाली दीखता है
और फिर घिरा रहता हूँ उसी में
दिन भर
रात भर
रोना मुस्कराना सब कुछ उसी में होता है
तुम्हारे यादों का संगीत
तुम्हारी प्यार की महक
तुम्हारे चेहरे की मुस्कराहट
महसूस करता हूँ
घिरा रहता हूँ दिन भर रत भर तुम्हारी यादों में

मिलता रहूगां
तुमसे एसे ही
और भरता रहूँगा रंग
हर एक खली पण में
जब तक मेरी पूरी दुनियां
पूरी तरह तुम्हारे रंग में नहीं रंग जाती …

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

कौसानी की यादें

शेखर के गांव में

मन्दिर का प्रसाद