मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः ।
भाग-१
दिमाग जिसका ध्यान आते ही हमारे सामने एक तंत्रिकवों का गुच्छा घुमने लगता है . हमारे सामने सोचने की शक्ति निर्णय लेने की शक्ति का प्रत्यय बनता है .और एक चेतना है जो हमारे शारीर में विद्यमान है .वह कहाँ है इसका कोई चित्र हमारे सामने नहीं बनता है .हमें पता नहीं है की चेतना रहती कहाँ है.बस कभी कभी जब दिमाग कुछ गलत(गलत सही सांस्कृतिक होता है ) कह रहा होता है ,जैसे किसी को बचाने की इच्छा तो हो रही है लेकिन हमें दिमाग रोकता है .कल्कुलेसन करने लगता है कि फायदा होगा की नुकसान .जबकि जो आवाज हमारे अन्दर (अन्दर का मतलब दूसरी आवाज )से आ रही होती होती है की उसको बचा लो वह आवाज पुकारती रहती है कि उसे बचा लो .अब जो आवाज बचा लो कह रही थी उसे हम दिल कहने लगते हैं .जो नफा नुकसान की बात कर रहा है उसे हम दिमाग कहने लगते है .मैं इन दोनो में कौन दिल की आवाज है और कौन दिमाग की यह नहीं जानता .क्योंकि मेरे पास इसका कोई प्रमाण नहीं है की दिमाग और दिल दो अलग जगहों से संचालित हो रहे हैं .हो सकता है की यह दिमाग की सोचने की एक प्रक्रिया का ही रूप हो .जिसे हम विभाजित कर रहे है .दो जगहों पर उसे देखने की कोसिस कर रहे हैं .हमारे पास केवल तर्क है जिसके माध्यम से हम कुछ मामला आगे बढ़ा सकते हैं .
क्या दिल (बहुत से लोग इसे आत्मा भी कहते हैं ) और दिमाग (जो सोचता है )दो अलग अलग सत्ताएं हैं .या हम भूल चुके हैं केवल मान रहें हैं .अब हम हम सोचना सुरु करतें हैं .एक ब्यक्ति जो सहायता के लिए पुकार रहा था उसे यह दिमाग बचाने क्यों नहीं दे रहा था वह क्यों रोक रहा था .दिमाग ने सोचना सुरु किया यदि मैं इसे बचाने गया तो मुझे मीटिंग में देरी हो जाएगी .लेकिन दिल कहता है किसी के जीवन से बड़ी तुम्हारी मीटिंग नहीं हो सकती है .दूसरा प्रश्न यह दिमाग ने दिया कि यदि मैं गया तो पुलिश मुझसे पूछताछ करेगी .और पुलिश का पूरा खतरनाक रूप हमारे शामने घुमने लगता है . दिल इसे नकारती नकारता है .यदि दिल के आवाज या तर्क ज्यादा ताकतवर होते हैं तो हम बचाने चले जाते हैं और यदि मन की बात सुनते है तो हम अपने काम पर चले जाते हैं.अब यहाँ एक एसे व्यक्ति को लाया जाय .जिसे यह न बताया गया हो कि पुलिश पूछताछ करती है .और जिसके पास समय हो वह जरा भी नहीं सोचेगा और उसे सहायता देगा .मतलब की परिस्थितियां व्यक्ति को सोचने पर मजबूर कर रही है .यहाँ इसके पास भी दिमाग और दिल था .लेकिन उसने उसकी सहायता की .न ही दिल की आवाज सुनानी पड़ी नही दिमाग की .अब एक तीसरा व्यक्ति जिसको समय और परिस्थितियां दोनों सही है वह आलसी है तो वह क्या करेगा .वह उसतरफ देखेगा और उसके अन्दर भी वही आत्मा और दिमाग का संघर्ष सुरु हो जायेगा .इस संघर्ष में कौन जीतेगा .दिल या दिमाग .आप खुद सोचिये .
दिल और दिमाग दो चीजें नहीं है . ये कहीं दो जगहों पर नहीं रहते हैं .दिल और दिमाग मन की तो क्षमताएँ हैं .तर्क करने के लिय हमें दो .यही दो स्वतंत्र निकाय है दिमाग और दिल .यह मान लेना की मन हमेशा गलत होता है और दिल सही यह भी गलत धारणा है .यह तो ट्रेनिंग के अनुसार भी निर्णय लेता है .क्योंकि यदि दिल और दिमाग दो अलग अलग सत्ताएं है तो एक बच्चे के अन्दर दिल उसके जन्म के समय से ही है .उसे नियंत्रित करना चाहिए .लेकिन कोई उदहारण नहीं है .यदि आप कहें की दिल का भी विकाश होता है .दिमाग का भी .एक साथ तो यह संभव क्यों नहीं हो सकता की दोनों एक ही है .बस तर्क करने के लिए दोनों की आवश्यकता होती है .ये दिमाग के ही दो स्तर है . के दो उदहारण पे जाएँ तो यही पता चलता है कि उसकी सहायता के लिए रुकते तो हैं लेकिन तर्क वितर्क होना सुरु हो जाता है .और हम एक को दिल और एक को दिमाग मान लेते है .यदि दिल और दिमाग दो अलग चीजे होती दो उस घटना स्थल पर लडती ही रहती .लेकिन कोई बचने पहुच जाता है तो कोई नहीं पहुचता .अंततः केवल एक काम हो रहा है या तो हम उसे बचाने जा रहें है या नहीं .हम दुविधा में वही खड़े नहीं रह जाते .मतलब की कोई सत्ता के दो स्तर आपस में तर्क कर रहें हैं .
अब बात आत्मा के विकास की करते है ,तर्क करने की क्षमता ,निर्णय लेने की क्षमता उसी में ज्यादा होगी जिसमें ये दोनों मन के स्तर सामान हों .समय और परिस्थिति के अनुक्सार निर्णय लेने के लिए दोनों का स्तर सामान होना चाहिए.
दिमाग जिसका ध्यान आते ही हमारे सामने एक तंत्रिकवों का गुच्छा घुमने लगता है . हमारे सामने सोचने की शक्ति निर्णय लेने की शक्ति का प्रत्यय बनता है .और एक चेतना है जो हमारे शारीर में विद्यमान है .वह कहाँ है इसका कोई चित्र हमारे सामने नहीं बनता है .हमें पता नहीं है की चेतना रहती कहाँ है.बस कभी कभी जब दिमाग कुछ गलत(गलत सही सांस्कृतिक होता है ) कह रहा होता है ,जैसे किसी को बचाने की इच्छा तो हो रही है लेकिन हमें दिमाग रोकता है .कल्कुलेसन करने लगता है कि फायदा होगा की नुकसान .जबकि जो आवाज हमारे अन्दर (अन्दर का मतलब दूसरी आवाज )से आ रही होती होती है की उसको बचा लो वह आवाज पुकारती रहती है कि उसे बचा लो .अब जो आवाज बचा लो कह रही थी उसे हम दिल कहने लगते हैं .जो नफा नुकसान की बात कर रहा है उसे हम दिमाग कहने लगते है .मैं इन दोनो में कौन दिल की आवाज है और कौन दिमाग की यह नहीं जानता .क्योंकि मेरे पास इसका कोई प्रमाण नहीं है की दिमाग और दिल दो अलग जगहों से संचालित हो रहे हैं .हो सकता है की यह दिमाग की सोचने की एक प्रक्रिया का ही रूप हो .जिसे हम विभाजित कर रहे है .दो जगहों पर उसे देखने की कोसिस कर रहे हैं .हमारे पास केवल तर्क है जिसके माध्यम से हम कुछ मामला आगे बढ़ा सकते हैं .
क्या दिल (बहुत से लोग इसे आत्मा भी कहते हैं ) और दिमाग (जो सोचता है )दो अलग अलग सत्ताएं हैं .या हम भूल चुके हैं केवल मान रहें हैं .अब हम हम सोचना सुरु करतें हैं .एक ब्यक्ति जो सहायता के लिए पुकार रहा था उसे यह दिमाग बचाने क्यों नहीं दे रहा था वह क्यों रोक रहा था .दिमाग ने सोचना सुरु किया यदि मैं इसे बचाने गया तो मुझे मीटिंग में देरी हो जाएगी .लेकिन दिल कहता है किसी के जीवन से बड़ी तुम्हारी मीटिंग नहीं हो सकती है .दूसरा प्रश्न यह दिमाग ने दिया कि यदि मैं गया तो पुलिश मुझसे पूछताछ करेगी .और पुलिश का पूरा खतरनाक रूप हमारे शामने घुमने लगता है . दिल इसे नकारती नकारता है .यदि दिल के आवाज या तर्क ज्यादा ताकतवर होते हैं तो हम बचाने चले जाते हैं और यदि मन की बात सुनते है तो हम अपने काम पर चले जाते हैं.अब यहाँ एक एसे व्यक्ति को लाया जाय .जिसे यह न बताया गया हो कि पुलिश पूछताछ करती है .और जिसके पास समय हो वह जरा भी नहीं सोचेगा और उसे सहायता देगा .मतलब की परिस्थितियां व्यक्ति को सोचने पर मजबूर कर रही है .यहाँ इसके पास भी दिमाग और दिल था .लेकिन उसने उसकी सहायता की .न ही दिल की आवाज सुनानी पड़ी नही दिमाग की .अब एक तीसरा व्यक्ति जिसको समय और परिस्थितियां दोनों सही है वह आलसी है तो वह क्या करेगा .वह उसतरफ देखेगा और उसके अन्दर भी वही आत्मा और दिमाग का संघर्ष सुरु हो जायेगा .इस संघर्ष में कौन जीतेगा .दिल या दिमाग .आप खुद सोचिये .
दिल और दिमाग दो चीजें नहीं है . ये कहीं दो जगहों पर नहीं रहते हैं .दिल और दिमाग मन की तो क्षमताएँ हैं .तर्क करने के लिय हमें दो .यही दो स्वतंत्र निकाय है दिमाग और दिल .यह मान लेना की मन हमेशा गलत होता है और दिल सही यह भी गलत धारणा है .यह तो ट्रेनिंग के अनुसार भी निर्णय लेता है .क्योंकि यदि दिल और दिमाग दो अलग अलग सत्ताएं है तो एक बच्चे के अन्दर दिल उसके जन्म के समय से ही है .उसे नियंत्रित करना चाहिए .लेकिन कोई उदहारण नहीं है .यदि आप कहें की दिल का भी विकाश होता है .दिमाग का भी .एक साथ तो यह संभव क्यों नहीं हो सकता की दोनों एक ही है .बस तर्क करने के लिए दोनों की आवश्यकता होती है .ये दिमाग के ही दो स्तर है . के दो उदहारण पे जाएँ तो यही पता चलता है कि उसकी सहायता के लिए रुकते तो हैं लेकिन तर्क वितर्क होना सुरु हो जाता है .और हम एक को दिल और एक को दिमाग मान लेते है .यदि दिल और दिमाग दो अलग चीजे होती दो उस घटना स्थल पर लडती ही रहती .लेकिन कोई बचने पहुच जाता है तो कोई नहीं पहुचता .अंततः केवल एक काम हो रहा है या तो हम उसे बचाने जा रहें है या नहीं .हम दुविधा में वही खड़े नहीं रह जाते .मतलब की कोई सत्ता के दो स्तर आपस में तर्क कर रहें हैं .
अब बात आत्मा के विकास की करते है ,तर्क करने की क्षमता ,निर्णय लेने की क्षमता उसी में ज्यादा होगी जिसमें ये दोनों मन के स्तर सामान हों .समय और परिस्थिति के अनुक्सार निर्णय लेने के लिए दोनों का स्तर सामान होना चाहिए.
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