भगत सिंह और हम
आज भगत सिंह का जन्मदिन है या इसप्रकार कहें की भगत आज के ही दिन जन्मा था .भगत का ख्याल आते ही दिमाग में एक साहसी युवामन हिलोरे मारने लगता है एक उत्साह का उफान उठता है .जब भगत का ख्याल आता है तो मन में बस कुछ कर गुजरने का ख्याल आता है .यह कुछ कर गुजरना सिर्फ बहरों के सुनाने के लिए नहीं .यह कुछ कर गुजरना इसलिए कि जब हम अंतिम साँस लें तो सुकून की साँस लें .हम ज्यादातर काम अपने संतुष्टि के लिए करते हैं,बस लगता भर है की दूसरों के लिए किया जा रहा है . भगत सिंह जब फंसी का फंदा चूम रहें होगें तब उनके मन में कुछ एक संतुष्टि रही होगी की कुछ कर के जा रहें हैं .बस वैसे ही मन एक भाव रहता है की कास हम भी कुछ करके ही जाएँ ...
भगत सिंह के जीवन की सबसे बड़ी सीख यही हो सकती है .हमें जो काम संतुष्ट करे हम वही करें लेकिन आज की उभोक्तावादी समय में सबसे कठिन है अपनी संतुष्टि के केंद्र को तलाशना .बाजार ने एक काल्पनिक दुनिया हमारे लिए बना दिया है जिसमें यह दिखाया जाता है की उपभोग ही संतुष्टि का केंद्र है जबकि यदि ऐसा होता तो जो भी सबसे ज्यादा उपभोग कर रहा है उसे संतुष्ट हो जाना चाहिए था लेकिन ऐसा नहीं है सबसे असंतुष्ट वही है जोप उपभोक्ता वादी है . उसके जीवन में सदैव एक खालीपन रहता है जिसकी भरपाई के लिए वह मृग मरीचिका की तलाश में घूमता रहता है .
यह कोई नहीं बता सकता है कि किसी व्यक्ति के संतुष्टि का केंद्र क्या है उसे खुद खोजना होगा .यह किसी भी पुस्तक में नहीं मिलेगा .यह मामला व्यक्तिगत है .जिसे हमें खुद खोजना ही होगा .
भगत सिंह के जीवन की सबसे बड़ी सीख यही हो सकती है .हमें जो काम संतुष्ट करे हम वही करें लेकिन आज की उभोक्तावादी समय में सबसे कठिन है अपनी संतुष्टि के केंद्र को तलाशना .बाजार ने एक काल्पनिक दुनिया हमारे लिए बना दिया है जिसमें यह दिखाया जाता है की उपभोग ही संतुष्टि का केंद्र है जबकि यदि ऐसा होता तो जो भी सबसे ज्यादा उपभोग कर रहा है उसे संतुष्ट हो जाना चाहिए था लेकिन ऐसा नहीं है सबसे असंतुष्ट वही है जोप उपभोक्ता वादी है . उसके जीवन में सदैव एक खालीपन रहता है जिसकी भरपाई के लिए वह मृग मरीचिका की तलाश में घूमता रहता है .
यह कोई नहीं बता सकता है कि किसी व्यक्ति के संतुष्टि का केंद्र क्या है उसे खुद खोजना होगा .यह किसी भी पुस्तक में नहीं मिलेगा .यह मामला व्यक्तिगत है .जिसे हमें खुद खोजना ही होगा .

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