एक बार मिली वह...
वह मिली एक बार……..
कई बार दिखी वह
मेट्रो में इ-रिक्से पर
ऑटो में ,कभी किसी ढाबे के पास से गुजरते हुए .
कई बार मिली
पर शयद मुझे उस ने देखा नहीं
खैर मैं भी गुम था भी
फिर एक दिन अचानक
मिल ही गयी आँखे
हाईवे के उस खम्भे के पास
इससे पहले अकेले नहीं गया था .
फिर वह मिली एक बार
जब मैं बाहर भूतकाल के कौड़ियों से
भविष्य का माकन बना रहा था
जहाँ हम पानी में
चिप्पियाँ उछलाया करते थे
जब आँखे मिली तो
हल्की सी मुस्कान बिखेर गयी चेहरे पर
……………
एक बार फिर मिली वह
पार्क के बेंच पर
बहुत करीब से देखा उसकी सुन्दरता को
और देखता
ही रहा
कुछ बात न की….
कुछ ऐसा उसका जादू था
निगाहें उसको खोजती
कुछ ऐसा उसका जादू था
जब भोर होती
कोयल की आवाज में जैसे वह पुकारती
कुछ ऐसा उसका जादू जैसे चाँद की किरणों में वह
बैठ के आती …
एक बार फिर मिली वह
उस जंगल में
जहाँ किसी यादों से निकलने
मैं जाया करता था
वह आम के डाली पर बैठी शांत
आज तो मिलना है मुझे
मैंने मोबाइल ,घडी ,सब वही पर रख कर
,कई स्मृतियों को किनारे कर
मैं चला उससे मिलने
वह भी जैसे मेरा इंतजार कर रही हो
वह उतारी
मैंने अपना हाथ बढाया
उसने अपनी बाहें फैला दी
मैं लिपटा रहा उससे और वह मुझसे
जब तक घुल नहीं गये
वह मुझमें घुली की मैं उसमें
मुझे नहीं पता
वह मेरे साथ चलती है की मैं उसके
मुझे नहीं पता ..
बस हम उस प्रकृति सुंदरी तन्हाई
से प्रेम करते हैं
और वह मुझे ….
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