झोका हवा का ...
तुम हमेशा ख्वाबों में आती हो
तन्हा रातों में
झींगुरों की आवाज पर बैठ कर
कभी हवा का झोका बन कर आना,
देखना
मैं नें तुम्हारे लिए
एक पेड़ लगाया है
गुलमोहर का ,
जिस को मैं प्यार में आंसुओं की तरह
सींच कर बड़ा करूगां
जिस को हवा में झूमते हुए देख
तुम्हारे आने का आहट महसूस करूगां
जिस की छाया में बैठ मैं
कम करूगां तुमसे मिलने की तपन को
मैं उसकी डाली पे झूला डालूगाँ
कभी हवा का झोका बन कर आना
और हलके से हिला देना झूले को
और देखना मैं तुमसे वैसे ही बातें आज भी करता हूँ
जैसे मैं पहले किया करता था ...
गुलमोहर के लाल गुच्छे
जब टहनियों पर लगेंगे
जब खेतों में पीली सरसों के फूल लहरानें लगें
तब आना हवा का झोका बन कर
लहरा जाना गेहूं के हरे खेतों को
और जाते हुए देख जाना
ये गुलमोहर ,सरसों के फूल
वैसे ही दिखाइ देतें हैं जैसे
पलास के फूल तुम्हारे
तुम्हारे बालों में लगते थे
जब सावन आएगा मैं
पत्ते से छन कर आती बूंदों में मैं
भीगा करूगां
आना तुम भी हवा का झोका बन कर
और छू कर मेरे बदन को
यादों की हरारत को कम कर जाना
जब मैं बैठा रहूँ
गुलमोहर की छांव में
हाथों में कागज लिए
आना तुम हवा का झोका बन कर
और समां जाना शब्दों के अंतरालों में
मेरी कविता बन कर
जब चिड़ियाँ
अपनें घोसलों से
उड़ने को बेताब हों
जब उम्मीद की किरण दिखने लगे
और घास पर पड़ी ओस की बूंद
मोतियों की तरह चमकनें लगे
जब परछाईयाँ छोटी होनें लगें
तब आना हवा का झोका बन कर
हिला देना हल्के से
गुलमोहर के लाल फूलों को
जीने की नयी वजह बन कर
जब मैं बैठा रहूँ
तन्हा शामों में
जब परछाईयाँ लम्बी हो जाएँ
पपीहे की आवाज जब
अन्दर घुसी जाए
तब कभी आना हवा का झोका बन कर
सुखा जाना मेरे आंसू
कोई दोस्त बन कर
-------------------------
कभी आना हवा का झोका बन कर
और देखना
लकड़ियों के डेर को
जो उसी पेड़ की टहनियों के हैं
तो जान लेना अंतिम सांसे होगीं मेरी
आना मेरे पास भी हवा का झोका बन कर
मेरी अंतिम साँस बन जाना
और देखना
मैंने अपना वादा पूरा कर लिया है
कभी हम मिल ना सके तो क्या हुआ
गुलमोहर की लकड़ी और
मेरी हड्डियों की राख तो होगी
आना तुम हवा का झोका बन कर
शारीर से उठते धुएं को अपने साथ उड़ा ले जाना
दूर कहीं
जहाँ तुम रहती हो ....
वाह मित्र बहुत ही गजब का संयोजन , शैली और प्रवाह है आपकी पंक्तियों में | मन का पोर पोर भीग गया | दो बार पढ़ चुका हूँ ..बहुत ही कमाल ..सुन्दर |
जवाब देंहटाएं